देश में शादी की बढ़ती उम्र जरूरत या मजबूरी

देश में शादी की बढ़ती उम्र जरूरत या मजबूरी

एक तरफ देश बाल विवाह से पीड़ित है और दूसरी तरफ प्रॉढ विवाह एक नई सामाजिक समस्या बन कर उभरी है . इसे शहरीकरण का असर कहें या बदलती जीवन - शैली का, अब भारत में भी शादी की उम्र बढ़ती जा रही है. यह दोहरी विसंगति है, साल 2011 की जनगणना में भी इस तथ्य क़ो रेखांकित किया गया था कि पिछले दस वर्षों में देश में युवा महिलाओं और पुरुषों की शादी की औसत उम्र बढ़ी है. जनगणना के आंकड़ों से स्पष्ट हो चूका है कि महिलाओं की शादी की औसत उम्र हीं नहीं बढ़ी है, बल्कि महिलाएं आर्थिक रूप से भी सबल हुई है. जहाँ 2001 में दस प्रतिशत महिलाएं काम - काजी थी,तो वहीं 2011 में यह आंकड़ा तेरह प्रतिशत हो गया है. गौरतलब है कि भारत में तैंतीस प्रतिशत महिलाओं की शादी अठारह साल से कम उम्र में हो जाती है, वहीं मात्र छह प्रतिशत पुरुषों की शादी अठारह वर्ष के उम्र से पहले होती है. ऐसे में महिलाओं के शादी की औसत उम्र क़ो किस तरफ से समझना चाहिए. हमारे समाज में आज भी लम्बे समय तक कुंवारी रह गई महिलाओं क़ो अच्छी नजर से नहीं देखा जाता माँ - बाप चाहते हैं की उनकी लड़की का करिअर चाहे बने या नहीं, पर उनकी शादी जल्दी हो जाए, तो वे गंगा नहा लें. यों शहरों में ये कायदे बदल रहे हैं. वहाँ बड़ी तादाद में लड़कियाँ शादी से पहले करिअर की फ़िक्र करने लगी है. यहीं कारण है कि अच्छे करिअर की चाह में उनकी शादी की कथित उम्र भी निकलने लगी है शायद लड़कियों या अविवाहित महिलाओं क़ो इससे ज्यादा फर्क न पड़े कि वे आखिर अकेले क्यों है? क्योंकि उनके पास अपने कामकाज या नौकरी के अलावा खुद क़ो व्यस्त करने वाली दिनचर्या के आलावा वह आर्थिक सुरक्षा भी है, जिसका हवाला या तर्क देकर हाल तक उन्हें शादी के बंधन में बांधा जाता रहा है. पूरी दुनिया में ' सोलो लाइफ ' का जो नया चलन उभर रहा है, उसमें खासतौर से महिलाओं ने दिखा दिया है कि वे अकेले रहकर मजे में और पुरुषों के मुकाबले कहीं ज्यादा सामाजिक जिंदगी जी सकती है. समस्या सुरक्षा और समाज के नजरिए का है, जो उनके अकेलेपन में बाधक है और भारत जैसे समाज में उन्हें मजबूर किया जाता है कि वे शादी शुदा जिंदगी बिताएँ. लेकिन इस मामले में हमारे समाज का दोहरापन उसके लिए समस्याएं ख़डी कर रहा है. वैसे तो आज ज्यादातर परिवार इसके लिए राजी होने लगे हैं की उन्हें अपने बेटे के लिए कमाऊ बहू मिल जाए. इससे घर में आने वाले चार पैसे से उनके रहन - सहन का स्तर सुधरता है और कथित तौर पर वे दहेज लेने की तोहमत से भी खुद क़ो बचा ले जाते हैं. पर शादी योग्य कमाऊ लड़कियों से यह अपेक्षा की जा रही है कि वे उन्हें गिनेचुने पेशों में हों, जिससे वे नौकरी के साथ घर - गृहस्थी की दोहरी जिम्मेदारी निभा सके. सबसे अच्छा तो यह होगा कि आस - पड़ोस के स्कूल में शिक्षक हों , जहाँ से दो - ढाई बजे फ़ारिग होने के बाद शुबह छोड़ दी गई अपनी वे सारी जिम्मेदारी उठा सके , जो एक घरेलू बहू से अपेक्षित होती है. इस अपेक्षा के दो अहम आधार है. पिछले कुछ अरसे से देश में बीएड करने वाली महिलाओं और टीचर्स ऐबिलिटी टैस्ट ( सीटेट और यूपीटेट ) जैसी परीक्षाओं में बैठने वाले अभ्यर्थीयों में महिला - पुरुष का अनुपात निकाला जाए तो यह साफ पता चल जाएगा कि समाज के दबाव में लड़कियां ही शिक्षक बनने में ज्यादा पहल कर रही है. बेशक , समाज कुछ बदला है. एक - डेढ़ दशक पहले तो लोगों क़ो अपने परिवार में कामकाजी बहू किसी कीमत पर मंजूर नहीँ थी. लोगों क़ो तर्क होता था कि उन्हें बहू की कमाई थोड़े ही खानी है, हालांकि, इसके एवज में दहेज तो जमकर लिया जाता रहा है. पर इधर डॉक्टर, शिक्षक, बीपीओ में काम करने वाली, आईटी एक्सपर्ट या नागरिक उडडयन, स्वास्थ्य सेवाओं जैसे सेक्टर की लड़की बहू के तौर पर ज्यादा स्वीकार्य होने लगी है, बशर्ते वे घर के कामकाज से तालमेल बिठा ले. बढ़ती महंगाई और आधुनिक रहन - सहन की चाहत ने हमारे समाज क़ो इतना तो झुकने के लिए मजबूर कर हीं दिया है कि कम से कम पंद्रह - बीस हज़ार रूपये महीना कमाने वाली बहू के परिवार में आगमन अब आर्थिक समस्या से निपटने का उपाय माना जाने लगा है. वैसे तो कहा जाता है कि शादी की सही उम्र वहीं होती है जब आप इसके लिए पूरी तरह से तैयार हों लेकिन इस उम्र का एक अनुमान गणित से भी लगाया जा चूका है. पिछले साल उटाह यूनिवर्सिटी की समाजशास्त्री निक वोलफिंगर ने इस बारे में एक आकलन किया और बताया कि गणितीय आकलन के मुताबिक शादी का सही उम्र अठाइस से बत्तीस के बीच है. इसकी वजह यह है कि इस उम्र में तलाक की आशंका सबसे कम होती है. इस उम्र तक आते - आते स्त्री - पुरुष मानसिक, शारीरिक और सामाजिक रूप से मजबूत हो चुके होते हैं और यही गुण लोगों क़ो अच्छा जीवनसाथी बनाता है. सर्वेक्षणो में यह जानने की गई थी कि किशोरावस्था और उसके खत्म होते हीं शादी करना तलाक की वजह क्यों बन रहा है. आकलन से उन्हें पता लगा की इस उम्र में शादी करने वाले अधिकतर लोगों की पसंद - नापसंद में बदलाव आता है जिसकी वजह से तलाक होते हैं. पड़ोसी मुल्क चीन में भी युवाओं में देर से शादी करने का चलन बढ़ रहा है, पर वहाँ के समाज ने खास तौर से लड़कियों क़ो लेकर एक अजीब टिप्पणी की है. वहाँ पचिस पार कर चुकी अविवाहित लड़कियों क़ो ' शेंग नु 'यानी ' बची - खुची ' लड़कियां ' कहकर सम्बोधित किया जाता है. पिछले कुछ वर्षों में वहाँ की सरकारी महिलावादी वेबसाइट ऑल चाइना वेमेंस पर बची - खुची लड़कियों पर कई सारे लेख तब तक प्रकाशित किए जाते रहे जब तक कि देश के कई महिलाओं ने इस पर आपत्ति नहीँ प्रकट की. हमारे देश में भी शिक्षा और करियर के लिए एक उम्र पार कर चुकी लड़कियों के लिए योग्य वर की तलाश कर पाना टेढ़ी खीर साबित होने लगा है क्योंकि उनतीस - तीस की उम्र की अविवाहित लड़कियों क़ो इस नजर से देखा जाता है कि उनमें कोई कमी होगी, अन्यथा उनकी शादी हो चुकी होती. देर से शादी के सामाजिक दबाव अपनी जगह है, लेकिन प्रकृति की व्यवस्था के लिहाज से भी विलंबित विवाह सही साबित नहीं हो रहा है. इंफ़र्टिलिटी क्लिनिकों की जो बाढ़ आई हुई है, उससे साफ साबित हो रहा है कि हमारे आधुनिक समाज में ऐसे दम्पतियों की संख्या तेजी से बढ़ी है जो वच्चे पैदा कर पाने में असमर्थ हैं. इसके पीछे शादी की बढ़ती उम्र क़ो एक बड़ी वजह माना जा रहा है. चिकित्सा जगत मानता है कि उम्र बढ़ने के साथ - साथ महिलाओं की प्रजनन क्षमता यानी माँ बनने की सम्भावना घटती जाती है. यही नहीं, अगर बढ़ती उम्र में महिलाएं माँ बन भी जाएँ तो कई तरह की दिक्क़तें आती है और इसे जन्म लेने वाले वच्चे के स्वास्थ्य के लिए भी खतरनाक माना जाता है. आमतौर पर महिलाओं के लिए बीस से तीस साल की उम्र माँ बनने के लिए सबसे बेहतरीन दौर माना जाता है. इसके बाद चालीस तक उनके माँ बनने की संभावनाएं बहुत तेजी से घटती है और चालीस के बाद न के बराबर रह जाती है. शिवाजी चौधरी, प्रधान सम्पादक, अनुराग भारत मीडिया ग्रुप, सम्पर्क : 9334375496

0 Response to "देश में शादी की बढ़ती उम्र जरूरत या मजबूरी"

एक टिप्पणी भेजें

Ads on article

Advertise in articles 1

advertising articles 2