दिखने लगा भारत पर युद्ध का असर

दिखने लगा भारत पर युद्ध का असर

ईरान और - इजराइल युद्ध का अंजाम चाहे जो हो, कोई जीते कोई हारे, लेकिन पूरा विश्व में आज हाहाकार मचा हुआ है. यहीं समय है की भारत अपने ऊर्जा सुरक्षा क़ो लेकर मंथन करे. एक दीर्घकालिक नीति बनाए, इसकी सिख हमें अपने पड़ोसी चिर प्रतिस्पर्धी चीन से सिखने की जरूरत है. आज पूरा विश्व युद्ध की विभीषिका से प्रभावित है तेल और गैस का संकट बढ़ता जा रहा है. लेकिन ऐसे हालात में भी चीन निश्चिन्त है.पश्चिम एशिया में युद्ध से उपजे हालात से भारत भी अब प्रभावित दिखने लगा है. हालांकि सरकार अब भी यहीं दावा कर रही है की हमारे पास तेल और गैस की कोई कमी नहीं है. लेकिन जमीनी स्तर पर हालात कुछ और बयां कर रहे हैं. कमरशियल (वाणिजयिक )एलपीजी और विमान ईंधन की कीमतों में बढ़ोतरी से स्पष्ट हो गया है कि समस्या अब विकट रूप ले रहा है, और इसकी मार आम जनता पर पड़ने वाली है. अगर ईरान - अमेरिका युद्ध लम्बा खींचा तो समझिए हालात और खराब होंगे. वैश्विक स्तर पर तेल के दामों में बढ़ोतरी होने के कारण तेल कम्पनीयों ने उन्नीस किलोग्राम गैस सिलेंडर के दाम 195. 50 रूपये बढ़ा दिए हैं. इसका असर ये होगा कि होटल, रेस्टोरेंट, ढाबों और रेहड़ी - पटरी पर भोजन करना तथा डिब्बाबंद खाद्य सामग्री अब महंगी हो जाएगी. इसके अलावा जहाज के ईंधन का दाम बढ़ाकर 2.07 लाख रूपये प्रति किलोलीटर से अधिक कर दिए गए हैं. हालांकि राहत की बात यह है कि सार्वजनिक क्षेत्र की पेट्रोलियम कम्पनीयों ने इस बढ़ोतरी क़ो घरेलू विमानन कम्पनीयों के लिए 8.5 फिसद तक हीं सिमित रखा है. फिर भी कब तक हवाई यात्रा महंगी होने से अछूता रह सकता है. हाल हीं में मिडिया में ऐसी खबरें आई है की ईरान ने भारत समेत पांच देशों के तेल व गैस जहाजों क़ो स्टेट ऑफ़ होर्मूज से गुजरने की अनुमति प्रदान की है. लेकिन कहा जा रहा है की अभी भी हमारे उन्नीस जहाज इस जलमार्ग पर फंसे हुए हैं. यानि स्थितियां इतनी जटिल है कि औपचारिक राहत देने के बावजूद भारत के लिए तेल - गैस जहाजों क़ो इस क्षेत्र से बाहर निकलना आसान नहीं है. 
शिवाजी चौधरी, प्रधान सम्पादक, अनुराग भारत मीडिया ग्रुप, सम्पर्क : 9334375496

जाहिर है, ऐसी स्थिति में ईंधन के वैश्विक संकट के असर से भारत भी नहीं बच सकता. घरेलू बाजार में जिस तेजी से वस्तुओं के दाम बढ़ने शुरू हुए हैं, उससे रोजमर्रा की चीजों की खरीदारी में आम लोगों क़ो यह सोचने पर विवश होना पड़ रहा है, कि क्या ज्यादा जरूरी है और क्या नहीं. खासतौर पर रसोई गैस और पेट्रोल - डीजल की उपलब्धता क़ो लेकर जिस तरह की स्थिति पैदा हुई है, उसे नियंत्रित करने के लिए सरकार अपने स्तर से पुरजोर प्रयास कर रही है. फिलहाल तो वाणिजयीक गैस सिलेंडर के दाम में वृद्धि की गईं है, लेकिन अगर युद्ध लम्बा चला, आपूर्ति सामान्य नहीं हुई तो आने वाले समय में घरेलू रसोई गैस के दाम भी बढ़ाया जा सकता है. इसका असर फैक्ट्रीयों, शिपिंग यार्ड, एक्सपोर्ट - इम्पोर्ट से जुड़े कामगारों पर भी दिखने लगा है. बिहार के मजदूर वर्ग अहमदाबाद, सूरत, गुजरात, मुम्बई, बंगलुरु से अपने गाँव लौटने लगे हैं. इसका मतलब साफ है की भारत में रोजगार पर भी युद्ध की काली छाया पड़ने लगा है. खाड़ी देशों में जो हमारे देश से माल भेजा जाता था वो बिल्कुल ठप हो गया है, बहुत सामान खराब हो रहा है. हालांकि घरेलू रसोई गैस और सामान्य पेट्रोल - डीजल के दामों में अभी बढ़ोतरी नहीं हुई है, क्योंकि सरकार इसकी कीमत स्थिर रखने की कोशिश कर रही है, लेकिन देखना होगा कि यह स्थिरता कब तक रहती है. सरकार के समक्ष भी यह गंभीर समस्या है की आम लोगों क़ो कैसे राहत दिया जाए. उत्पाद शुल्क में कटौती से खुले बाजार में पेट्रोल और डीजल के दाम क़ो स्थिर रखने में मदद मिल सकता है, लेकिन अभी असली समस्या उपलब्धता की है. ऐसे में जरूरी है कि सरकार कच्चे तेल की खरीद के लिए अन्य विकल्प पर भी गंभीरता से विचार करे. क्योंकि युद्ध अगर लम्बा चला जैसा की लग रहा है, तो ईंधन की आपूर्ति और ज्यादा प्रभावित होगी तथा घरेलू स्तर पर इस समस्या से निपटना एक चुनौती से कम नहीं होगा.

 

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