खतरे में भारत का भविष्य
ये देश है तुम्हारा नेता तुम्हीं हो कल के. भारत में हर साल औसतन नब्बे हज़ार बच्चे खोने की रिपोर्ट थानों तक पहुंचती है. इनमें से तीस हज़ार से ज्यादा का पता नहीं लग पाता है. यह आंकड़ा है भारत सरकार के राष्ट्रीय अपराध रिकार्ड ब्यूरो का. पिछले साल संसद में पेश एक आंकड़े के मुताबिक सिर्फ 2011से 2025 के बीच सवा तीन लाख से ज्यादा वच्चे लापता हो गए. जब भी इतने बड़े पैमाने पर वच्चों के गुम होने के तथ्य आते हैं तो सरकारी तंत्र रटे - रटाए औपचारिक स्पष्टीकरण जारी करने की बातों से आगे कुछ नहीं कर पाता. संयुक्त राष्ट्र की एक रिपोर्ट का दावा है कि भारत में हर साल तकरीबन 24, 500 वच्चे गुम हो जाते हैं. यहाँ 2011 - 2025 के बीच हर वर्ष दो लाख से ज्यादा बच्चों की नदारद हो जाने की खबर पुलिस थानों तक पहुंची. मध्यप्रदेश से 50, 836 दिल्ली से 38, 948 ओर आंध्राप्रदेश से 36, 540 बच्चों के अचानक लापता होने की सूचना दी गईं. बिडंबना है कि गुम हुए बच्चों में लड़कियों की संख्या सबसे ज्यादा होती है. 2011 में गुम हुए कुल 90. 654 वच्चों में से 53, 683 लड़कियां थी. 2012 में कुल गुमशुदा 65, 038 में से 39, 336 औऱ 2013 में गुमशुदा 1, 35,262 में से 68, 869 वच्चीयां थी. 2014 में 36, 704 वच्चे गायब हुए जिनमें 17, 944 बच्चीयां थी ऐसे हीं आंकड़े 2025 तक हैं जिसमें गायब होने वालों में वच्चियों की संख्या ज्यादा है. लापता वच्चों से सम्बंधित आंकड़ों की एक हकीकत यह भी है कि राष्ट्रीय अपराध रिकार्ड ब्यूरो सिर्फ अपहरण किए गए बच्चों की गिनती बताता है. ज्यादातर मामलों में पुलिस प्राथमिकी दर्ज करने से इनकार कर देती है या टालमटोल करती है. बच्चों के गुम होने के संदर्भ में राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग की एक रिपोर्ट बेहद डरावनी और सभ्य समाज के लिए शर्मनाक है. इसमें कहा गया है कि भारत में हर साल दर्ज होनेवाली पैतालिस हज़ार से ज्यादा बच्चों की गुमशुदगी की रिपोर्ट में से तकरीबन ग्यारह हज़ार बच्चों का कोई नामोनिशान तक नहीं मिल पाता है. यह एक दुखद, लेकिन चौकाने वाला तथ्य है कि भारत में हर दसवां बच्चा यौन शोषण का शिकार हो रहा है. यहीं नहीं सुप्रीम कोर्ट भी चेता चुका है कि हमारा देश बाल वेश्यावृति के मामले में एशिया की सबसे बड़ी मंडी के रूप में उभर रहा है. अलवर जिले के दो गाँवों में पुलिस के छापे से पता चला कि कम उम्र की वच्चियों का अपहरण किया जाता है.
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| शिवाजी चौधरी, प्रधान सम्पादक, अनुराग भारत मीडिया ग्रुप, सम्पर्क : 9334375496 |
फिर उन्हें इन गाँवों में ले जाकर ' बलि के बकरे ' की तरह खिलाया - पिलाया जाता है. गाय - भैंस से ज्यादा दूध लेने के लिए लगाए जाने वाले हार्मोन के इंजेक्शन ऑक्सीटाशीन देकर छह - सात साल की उम्र की इन लड़कियों क़ो कुछ हीं दिनों में 14 - 15 साल की तरह किशोर बना दिया जाता है और फिर उन्हें यौन संबंध बनाने के लिए मजबूर किया जाता है. अभी अलवर, मेरठ, आगरा, मंदसौर सहित कई जिलों के कई गाँव इस पैसाचिक कृत्य के लिए जाने जाते हैं. पुलिस छापे मारती है, वच्चियों क़ो महिला सुधार गृह भेज दिया जाता है. फिर दलाल लोग हीं वच्चियों के परिजन बन कर उन्हें महिला सुधार गृह से छुड़ाते हैं और सुदूर किसी मंडी में फिर उन्हें बेंच देते हैं. इस बात क़ो लेकर सरकार कुछ खास गंभीर नहीं है कि भारत, बांग्लादेश, नेपाल जैसे पड़ोसी देशों की गरीब वच्चियों की तिजारत का अंतराष्ट्रीय बाजार बन गया है. समाज में वच्चों का एक समूह और है, जिनसे जबरन भीख मंगवाई जाती है. पर्यटन स्थलों, चौराहों, लालबती और रेलवे स्टेशनो के पास ऐसे वच्चों क़ो देखा जा सकता है. इस धंधे में पूरा माफिया तंत्र सक्रिय है. इसके अलावा बाल तस्करी, बाल वेश्यावृति, बालिकाओं का यौन शोषण जैसी समस्याएं भी बढ़ रही है. कहने क़ो सरकार की ओर से ऐसी घोषणाएं सुनने क़ो मिल जाती है कि वच्चे देश और समाज का भविष्य हैं. लेकिन इसके प्रति सरकारें खुद कितनी गंभीर है, इसका अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि किशोर न्याय अधिनियम के तहत पिछले सालों में आजतक एक सलाहकार समिति तक गठित नहीं कि जा सकी है. अदालत क़ो सरकार की जिम्मेदारी बार - बार याद दिलानी पड़ती है.दिल्ली मे हुए एक अध्ययन में पता चला था की जितने भी बच्चे गायब हुए हैं, उनके माता - पिता बेहद गरीब थे. सवाल है कि क्या इसी वजह से सरकारें इस समस्या क़ो पर्याप्त गंभीरता से नहीं लेती ? लापता वच्चों का नहीं मिलना पुलिस और प्रशासन की नाकामी मात्र नहीं है बल्कि उन अभिभावकों की अंतहीन पीड़ा है जिन्हें जीवनपर्यंत अपने वच्चे से अलग हो जाना पड़ता है. इसलिए यह जरूरी हो गया है कि कुछ ऐसे नए आयामों की ओर दृष्टि डाली जाए जो गुमशुदा वच्चों क़ो तलाशने में मददगार हो सके. वच्चे किसी देश और समाज की बुनियाद होते हैं और उनके प्रति संवेदनहीनता, देश के भविष्य के लिए घातक है, इसलिए यह जरूरी है कि वच्चों के संरक्षण और उनके अधिकारों की रक्षा क़ो पहली प्राथमिकता दी जाए.

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