फिर भिंड प्रबंधन पर सवाल,.....
बिहार के नालंदा जिले के, बिहारशरीफ़, दीपनगर थाना क्षेत्र के मघड़ा मेला, शीतला मंदिर में आस्था का उल्लास चंद समय में चीख - पुकार और मातम में बदल गया. शीतला मंदिर में मची अफरा - तफरी में आठ महिलाओं की मौत से पूरा प्रदेश, व देश मर्माहत है. हालांकि ये कोई पहली घटना नहीं है, आखिर कब तक ऐसे हीं मौत का तमाशा चलेगा, हम, हमारा प्रशासन और आयोजक क्यों नहीं पीछे हुए हादसों से सीखते हैं. इस भगदड़ में महिलाओं की मौत का कौन जिम्मेदार है? सवाल तो बनता है? ऐसी घटना देश में सैकड़ों घट चुकी है, प्रशासन कब जगेगा? भीड़ प्रबंधन कब सीखेंगे? आखिर ऐसी कितनी घटनाएं घटेगी, तब प्रशासन संवेदनशील बनेगा. हादसा के बाद कुछ दिनों तक प्रशासनिक व्यवस्था दुरुस्त दीखता है, इसके बाद फिर जैसे क़ो तैसा. हालांकि मृतकों क़ो राज्य सरकार एवं केंद्र सरकार की ओर से मुआवजे का ऐलान किया गया है, लेकिन सवाल मुआवजा मिलने तक सिमित नहीं है, मौत की कीमत चंद रूपये नहीं होता. मंदिर परिसर से लेकर सरकारी अस्पताल तक का दृश्य इतना खौफनाक और दर्दनाक था कि देखने वालों का कलेजा काँप उठा. अस्पताल परिसर में बिलखती महिलाएं और, माँ के शव से लिपट फुट - फुट कर रो रहे वच्चे तंत्र से सवाल कर रहे थे, कब जगोगे?.
शिवाजी चौधरी, प्रधान सम्पादक, अनुराग भारत मीडिया ग्रुप, सम्पर्क : 9334375496
देश विकास करता जा रहा है, लेकिन आपदा प्रबंधन में फिसड्डी होता जा रहा है, गौरतलब है की मेला या कार्यक्रम के आयोजक भिंड का सही - सही अनुमान क्यों नहीं लगा पाते. भिंड प्रबंधन हमारे देश में लगातार चुनौती बनता जा रहा है. कुम्भ के दौरान सैकड़ों लोगों की मौत, फिलहाल में तमिलनाडु के करूर में अभिनेता विजय की राजनितिक रैली में मची भगदड ने 50 से अधिक लोगों की जान ले ली थी, जबकि सैकड़ों लोग घायल थे. उससे कुछ दिन पहले आईपीएल क्रिकेट टीम रॉयल चैलेन्जर्स बेंगलुरु के विजय जुलुस में भगदड से 10 से ज्यादा लोग अपनी जान गंवा बैठे थे. कुम्भ मेले के दौरान नई दिल्ली रेलवे स्टेशन के हादसा हम कभी नहीं भूलेंगे. और पीछे भी बहुत सी ऐसी तमाम घटनाएं हुई हैं. ये सभी घटनाएं इस बात की तरफ इशारा करती हैं कि ढांचागत विकास व तकनीकी तरक्की के बावजूद प्रशासन के स्तर पर आपराधिक लापरवाही की प्रवृति दूर नहीं हो रही है. और इसका सबसे बड़ी कीमत निरीह, बेगुनाह आम लोग चुका रहे हैं, उसमें भी महिलाएं बिशेष रूप से. शीतला माता मंदिर में ये सभी भक्त अपने और अपने - परिवार जनों की कुशलता के लिए प्रार्थना करने गईं थीं, उनको क्या पता उनका यह दर्शन आखिरी दर्शन हो जाएगा. श्रद्धालु जनों क़ो भी सोंचना होगा, धैर्य रखना चाहिए, कोई भी धर्म विशेषकर सनातन धर्म का आधार हीं करुणा और दया है, फिर एक - दूसरे क़ो धक्का देकर, शारीरिक चोट पहुंचाकर पुण्य कैसे प्राप्त किया जा सकता है. दुर्भाग्य से, देश के ज्यादातर धर्मस्थल अराजकता के शिकार हैं और इसमें केवल प्रशासन हीं नहीं, नागरिकों, दर्शनार्थियों के स्तर पर भी सुधार की आवश्यकता है. यह सभी जिला प्रशासनों की जिम्मेदारी होनी चाहिए की अपने जिले के तमाम धार्मिक स्थलों, वहाँ होने वाले कार्यक्रमों और उनमें जुटने वाले अनुमानित भीड़ का एक डाटा तैयार करें. इससे उनका बेहतरीन प्रबंधन किया जा सकेगा. और श्रद्धांलुओं की शिकायत भी कम हो जाएगी. हम एक बहु धार्मिक देश हैं, यहाँ आए दिन धार्मिक आयोजन होते रहते हैं और जिनमें बड़ी संख्या में श्रद्धालु भाग लेते हैं. इसको बेहतरीन बनाने की जितनी जिम्मेदारी प्रशासन की है उतनी हीं हमारे नागरिक समाज की भी है. इन कार्यों में हमें धर्म गुरुओं का भी पूरा सहयोग लेने की आवश्यकता है
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