असुरक्षित होती बेटियाँ
यह सत्य है कि पिछले 70 वर्षों में भारतीय महिलाओं में बहुआयामी परिवर्तन आए हैं. यह परिवर्तन उसके परिवेश, खान - पान, रहन - सहन, पहनावे - ओढ़ावे में तो आया हीं है, सोंच और विचार में भी तेजी से आया है. दरअसल सोंच - समझ और विचार के परिवर्तन ने हीं महिला की दैनंदिनी में बदलाव लाकर दिखाया है. हाट, बाजार, स्कूल, कॉलेज, मिल - फैक्ट्रीयों और दफ्तरों में हीं नहीं, लोकतान्त्रिय संस्थाएं, स्थानीय निकायों में भी महिलाओं की विशेष उपस्थिति से परिवेश रंग - विरंगा हुआ है. आज के परिप्रेक्ष्य में स्त्री क़ो ससम्मान पुरुष के समान जीवन के हर क्षेत्र में विकास के अवसर देने की आवश्यकता है. ऐसी स्थितियाँ निर्मित करनी आवश्यक है, जिनमें स्त्री इस अवसरों का समुचित लाभ उठाकर विकास की राह पर तेजी से बढ़ सकें. इसके निमित्त जहाँ एक ओर स्त्री के भीतर विद्यमान सुप्त चेतना क़ो प्रबल बनाना है, वहीं दूसरी ओर स्त्रियों से जुड़े मुद्दों और प्रश्नों क़ो समाज की चिंता और चिंतन का केंद्र बनाना है. लड़कियों क़ो सशक्त बनाने के पहल में इस बिंदु पर ध्यान देना आवश्यक है कि उसे लड़कों के समान साधनों की आवश्यकता है. पीढ़ियों से पुरुष के पीछे रहकर नारी ( लड़कियों ) के अंदर हीन भाव की सख्त गांठ पड़ गई है. लड़कियों के जागरूकता ( सशक्तिकरण ) का प्रथम आशय इस हीन भाव की गांठ क़ो खोलना है ताकि हमारी युवा पीढ़ी नारी के कर्तव्यों से विमुख होने का मन न बनाए. वे स्वयं अपना विकास पुरुष बनाने की ओर नहीं करें. स्वयं नारी अपने मानवी रूप क़ो स्वीकार करें समाज भी उसे मानवी माने. लड़कियों के सशक्तिकरण में यह भी प्रयास होना चाहिए कि लड़कियों की समस्या और उपलब्धियों क़ो सम्पूर्ण समाज की समस्या और उपलब्धि बना सके. नारी सशक्तिकरण के नाम पर उसे पुरुष, परिवार और समाज से अलग न करें. पिछले दो दशकों में महिला आयोग, महिला थाना, परिवार न्यायालय, परिवार परामर्श केंद्र राष्ट्रीय महिला आयोग, जैसे अनेक निकायों के गठन का उद्देश्य स्त्रियों, वच्चियों के अधिकारों क़ो सुरक्षा तथा संरक्षण प्रदान करना हीं रहा है.
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| शिवाजी चौधरी, प्रधान सम्पादक, अनुराग भारत मीडिया ग्रुप, सम्पर्क : 9334375496 |
स्त्रियों क़ो सुरक्षा और संरक्षण प्रदान करने के लिए न्यायालय ने भी अनेक दूरगामी निर्णय दिए. उच्चतम न्यायालय ने शाहबानो प्रकरण में जो फैसला दिया उससे जहाँ यह बात सिद्ध हुई की कतिपय पुरानी परम्पराओं के नाम पर स्त्री क़ो यातना भरा जीवन जीने के लिए विवश नहीं किया जा सकता. दूसरी ओर यह भी स्थापित किया कि यह संवेदनशील देश की निर्धन और पिछड़ी स्त्रियों क़ो उनके हाल पर जीने के लिए नहीं छोड़ सकता. कुदरत ने जो दुनिया की सबसे सुरक्षित जगह बनाई है -- माँ की कोख - उसमें हीं अगर बेटी का दम घोंट दिया जाए, तो बाकी जगह उसकी सुरक्षा क़ो लेकर क्या कहा जा सकता है. इसके लिए सरकार क़ो उन डॉक्टरों और चिकित्सा संस्थानों के खिलाफ ऐसी सख्त कार्रवाई सुनिश्चित करनी होगी, जो सोनोग्राफी के जरिए कोंख में लड़का या लड़की की अवैध ढंग से पहचान करके उसके जीवन क़ो खतरे में डाल देते हैं. यह पहचान कराने वाले बहुत पढ़े - लिखे लोग होते हैं. इनसे अपेक्षा की जाती है कि समाज में जागरूकता फैलाएं, मगर ऐसे लोग भी नैतिक गिरावट का शिकार होकर अजन्मे शिशुओं की हत्या के रास्ते खोलते हैं, तो अंदाजा लगाया जा सकता है कि हम कैसे हत्यारों के समाज में रहने क़ो मजबूर हैं. देश के पंद्रह जिले ऐसे हैं जहाँ पुरुष और महिलाओं का औसत अनुपात काफ़ी कम है. हरियाणा में नारनौल के आसपास के साठ गाँवों में पिछले एक साल में एक भी लड़की पैदा नहीं हुई. क्या यह महज संयोग है या इसके पीछे भी वहीं हत्यारी मानसिकता काम कर रही है. जो बेटियों क़ो दुनिया में आने से पहले हीं मौत की नींद सुला देती है. सरकार चाहे जितना अपनी खजाने का मुँह खोल दे चाहे बेटियों के लिए जितनी परियोजनाएँ चलाए, अगर बेटियों क़ो लेकर समाज का सोंच नहीं बदलेगा तो यह संभव हीं नहीं है कि इसका फायदा लड़कियों तक पहुंच सके.बेटियों की आबादी बढ़ाने तथा उनकी सुरक्षा के लिए वित्तीय सहायता देने से अधिक जरूरी समाज के सोंच में बदलाव लाना है. जब यह समाज किसी न किसी तरह मेहनत - मजदूरी करके बिना सरकारी मदद के लड़कों क़ो पाल - पोश, पढ़ा - लिखा कर बड़ा कर देता है, तो हमारी बेटियों के मामले में उसे क्यों तकलीफ होने लगती है. इसकी वजह हमारी संकीर्ण मानसिकता है, जो बेटियों क़ो न केवल बोझ समझती है, बल्कि बनाती भी जा रही है अगर लड़कियों के खिलाफ अपराध होते हैं, तो इसके लिए वे खुद उत्तरदायि नहीं हैं. अगर उन्हें कोई अपनी हवस का शिकार बनाता है तो वह भी इसी समाज का हिस्सा होता है. अगर समाज में लड़कियों कि सुरक्षा की जरूरत पेश आती है, तो इसके लिए समाज के लोग हीं जिम्मेदार हैं. नारी, पुरुष के बराबर नहीं, उससे बिशेष है. इसलिए बिशेष शिक्षा, बिशेष सुरक्षा, आरक्षण और सम्मान की अधिकारिणी है. " मैं नारी हुँ नर क़ो मैंने हीं जन्म दिया " मैं नहीं चाहता बेटी, कि तेरा राह चलना हो जाए दुभर, आदम की आँखों की बहशियत से डरकर. और तू तय न कर पाए अपनी मंजिल, मै नहीं चाहता बेटी, कि जमाना चुरा ले तेरी मुस्कान, तुझे आँखें चुरानी पड़े अपने हीं सपनों से, और तुझे सोंचना पड़े कि मैं लड़की क्यों हुई ? मैं नहीं चाहता बेटी...............

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