जंग की क़ीमत

जंग की क़ीमत

जंग की क़ीमत, अमेरिका - इजराइल - ईरान युद्ध भले दो देशों के बीच होता दिख रहा है, पर इसकी मार किसी न किसी रूप में पूरी दुनिया क़ो झेलनी पड़ रही है. अमेरिका - ईरान युद्ध का पहला बड़ा असर तो कच्चा तेल महंगा होने, एलपीजी गैस की किल्ल्त के रूप में सामने आ चूका है. जंग अब रसोई तक पहुंच गया है भारत में एक - एक गैस सिलेंडर के लिए लोग घंटो लाईन में लग रहे हैं इसके बाद भी गैस नहीं मिल रहा है, हालांकि सरकार कह रही है की गैस की कोई कमी नहीं है लेकिन जमीनी - स्तर पर वास्तविकता कुछ और दिख रहा है. ईरान होर्मूज क़ो बन्द कर दिया है सैकड़ो तेल टैंकर खडे हैं, दुनिया का सप्लाई चेन बाधित हो गया है. कच्चे तेल के दाम किसी भी देश की अर्थव्यवस्था पर सबसे पहले और तेजी से असर डालते हैं . ईरान कोई वेनेजुएला नहीं है, इसे अब अमेरिका बखूबी समझ रहा होगा. वेनेजुएला की हुकूमत तो झूठे - फरेबी लोगों के हाथ में थी, जिसके कारण राष्ट्रपति मादुरो की गिरफ्तारी के बाद भी सबकुछ शांत हो गया. ईरान के लोग अपनी आस्था पर पूरा यकीन रखते हैं अमेरिका का ये समझना अब भारी पड़ रहा है की आयतुल्ला ख़ामीनेई की मौत के बाद ईरान बिखर जाएगा, उसकी जनता बगावत कर सत्ता बदल देगी लेकिन खामेनई के मौत के बाद ठीक उल्टा हुआ लोगों के बीच सहानुभूति की लहर दौड़ गई.अमेरिकी राष्ट्रपति जब युद्ध की घोषणा करता है तो कम्पनियों के शेयर - सूचकांक आसमान छूने लगते हैं, खासकर रक्षा उत्पादन से जुडी कम्पनियों के लाभ में बढ़ोतरी की संभावना बढ़ जाती है, डॉलर अन्य मुद्राओं से अधिक मजबूत होकर उभरता है. जबतक सीरिया में बशर - अल - असद, ईरान में खामेनई, मोसादेह, इराक के सद्दाम हुसैन, गद्दाफी आदि नेता, जो अमेरिकी नीतियों का समर्थन नहीं करते थे, मुजतबा खामेनई उनसे अलग कतई नहीं हैं, और अगर वे सम्राज्यवाद से कोई समझौता करने से इनकार करते हैं तो उनका भविष्य भी बाकियों से अलग नहीं होगा. सीरिया और ईरान पर हमले की तैयारी कई दशक से चल रही है फ्रांस से मुक्ति पाकर सीरिया आजाद हुआ तो उसकी संसद क़ो अमेरिका द्वारा इजराइल क़ो मान्यता प्रदान करना रास नहीं आया. लिहाजा उसने अरेबियन - अमेरिकन आयल कम्पनी की पाइप लाईन क़ो अपने देश के भीतर बिछाने की अनुमति नहीं दी. अमेरिका चाहता था, कि सऊदी अरब से तेल मंगाने के लिए पाइपलाईन सीरिया से होकर आए. तब से लेकर आज तक अमेरिका ने इस योजना क़ो ठंडे बस्ते में नहीं डाला है अब उसने रासायनिक हथियारों का मुद्दा उठाया है, ईरान पर भी अमेरिका ने परमाणु बम बनाने का आरोप लगाया है, एवं उसके मिसाइल प्रोग्राम क़ो भी बन्द करना चाहता है इसीलिए सीरिया - ईरान में राजनितिक बदलाव चाहता है. दरअसल, पूरी दुनिया देख चुकी है कि इराक के पास जनसंहार के हथियार होने के तर्क पर अमेरिका का उस पर हमला करना गलत सिद्ध हुआ. इराक और अफगानिस्तान में अमेरिका और अन्य सम्राज्यवादी देशों के हज़ारों सैनिकों समेत बीस लाख से अधिक लोग मारे जा चुके हैं. इसलिए आज अमेरिका की इस बात पर कोई विश्वास करने क़ो तैयार नहीं है कि ईरान सरकार के पास परमाणु बम बनाने के लिए क्षमता है. दूसरे, जब खुद अमेरिका के पास रासायनिक और परमाणु हथियारों का बड़ा जखीरा है तो वह किस नैतिक बल पर ईरान या किसी अन्य देश से पूछ सकता है कि उसके पास कौन से हथियार है. कौन नहीं जानता कि 1965 और 1975 के बीच कई लाख टन नापाम बमवियतनाम के जंगलों क़ो जला देने के उद्देश्य से गिराए थे, ताकि वहाँ छिपे स्वतंत्रता सेनानी भागने पर मजबूर हों. उन बमों का असर यह हुआ था कि एक जलता हुआ जेली - नुमा पदार्थ चमड़ी से तब तक चिपका रहता था जब तक कि वह मांसपेशियों और हड्डीयों क़ो गला न दे. अमेरिका ने पांच करोड़ टन रासायनिक पदार्थ, एजेंट ऑरेंज, वियतनाम के पौधों क़ो बर्बाद करने के उद्देश्य से इस्तेमाल किया. ये जहरीली गैस मिट्टी और पानी में घुल गई जिसका असर खाद्द - पदार्थों पर हुआ. कई पीढ़ियां इससे प्रभावित हुई. दस लाख वियतनामी नागरिक मारे गए और चार लाख वच्चे विकलांग पैदा हुए. 1969 - 73 के बीच अमेरिका ने पांच लाख तीस हज़ार टन बम कम्बोड़िया पर गिराए, जिससे दस लाख लोग मारे गए और उस देश का चावल उत्पादन सत्तर प्रतिशत कम हो गया. कम्बोड़िया के पचहतर प्रतिशत पशु इस बमबारी मारे गए. कोरिया के युद्ध में अमेरिका ने रासायनिक हथियारों का बड़ी मात्रा में इस्तेमाल किया. सीरिया - ईरान - इराक - अफगानिस्तान का इतिहास लिखा जाएगा, तो उसमें यह दर्ज होगा कि सम्राज्यवादियों ने सीरिया - ईरान - इराक - अफगानिस्तान और उसकी सरकार क़ो इसलिए अपने हमले का निशाना बनाया कि उसने स्वतंत्र आर्थिक और विदेश नीतियाँ अपनानी चाही, कि उसने लीबीया में युद्ध की मुखालफ्त की. यह वहीं अमेरिका है, जिसने कत्तर, सऊदी अरब, तुर्की, इजराइल और फ्रांस के साथ मिल कर सीरिया में बशर अल असद की सरकार क़ो गिराने के लिए इन भेड़ियों क़ो हथियार दिलवाया और इन्हें सीरिया के क्रान्तिकारी बताया. रूस, चीन और ईरान की मदद से बची बशर की सेना ने जब इन आतंकवादियों क़ो धकेला तो ये इराक में आ गए. अगर सीरिया में बशर की सरकार गिरती तो क्रान्तिकारी कहलाते, लेकिन बिना अमेरिका की मर्जी के इराक में उसके राजनितिक उद्देश्यों क़ो पलिता लगाने के लिए सऊदी अरब के पूर्व ख़ुफ़िया प्रमुख बंदर बिन सुल्तान के एजेंडे क़ो पूरा करने के लिए घुस आने पर अमेरिका क़ो ये आतंकवादी नजर आने लगे. अमेरिका दुनिया क़ो क्या जबाब देगा जिस सांप क़ो दूध पिलाया उसका मुँह क्यों कुचलने लगे? सांप बशर क़ो काट लेता तो अच्छा था. लेकिन इराक में अमेरिकी टोली और कत्तर के राजनितिक उद्देश्यों क़ो डसने लगा तो बुरा क्यों हो गया? इतनी बदनामी से थोड़ी बेहयाई अच्छी है.भारत की नई सरकार इजराइल के बहुत करीब है और कई मसलों पर उसके साथ मिल कर चलना चाहती है. लेकिन इससे क्या इजराइल के दुश्मन भारत के दोस्त बने रहेंगे ? कत्तर की तानाशाही के नजदीक आ चुके अलकायदा की पूर्व में मिले धमकी कहीं भारत के लिए इजराइल से बेपनाह मुहब्बत से मिला गम न साबित हो? जवाहिरी का वीडियो सामने आने के बाद गृह मंत्रालय और ख़ुफ़िया एजेंसियों की बैठक हुई और इस मुद्दे पर गहन विचार - विमर्श किया गया. इन ज्ञानियों ने मिलकर उन्हीं फार्मूलों पर बात की होगी जिन्हें अब तक आजमा रहे हैं, उसके आगे वो जा भी नहीं सकते. आज वहाबी आतंकवाद जितना विकृत, विभत्स और विकराल हो चूका है उसके सबसे बड़ी वजह वहाबी विचारधारा के संस्थानीकरण के है. जिन्हें पत्तीयां तोड़ने पर दरख्त के खत्म होने का भ्रम रहता है, उनका वह भ्रम अब भी क़ायम है. जड़ों की जानकारी किसी आईबी या रॉ के पास नहीं है. चेचन्या के राष्ट्रपति रमजा कादिरोव के फॉर्मूले की जरूरत है. जब समस्या इस्लाम के अंदर बिगाड़ करने से पैदा हुई तो इस्लाम के बाहर उसका निदान कैसे किया जा सकता है? खून में संक्रमण होने पर त्वचा पर क्रीम लगाने से मर्ज ठीक नहीं होता. इस्लाम की बुनियादी बातों क़ो बदल कर वहाबी विचारधारा का संस्थानिकरण किया गया है, इस्लाम में हीं जो लोग इसके खिलाफ बुनियादी लड़ाई लड़ रहे हैं, वहीं इसका उपाय भी बताएंगे. पत्तीयां तोड़ने वाले माली कहलाते हैं और जड़ें जताने वाले काशतकार. ईमानदार काशत्कार कभी धतुरे के बिजों क़ो धान कहकर नहीं बोने देगा. माली अपना कर्तव्य भूल भी जाए लेकिन भारत समेत पूरी दुनिया के सूफ़ी काशत्कार जानते हैं कि इस्लाम के बगीचे की जड़ें और बीज क्या है और अगर खर पतवार उग आए तो वह साफ कैसे की जाती है. बहरहाल अमेरिका के युद्धन्माद एवं दादागिरी से दुनिया परेशान है. दुआ करें युद्ध जल्दी खत्म हो क्योंकि युद्ध की आंच अब रसोई तक पहुंच गई है.

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