महिलाओं की यौन उत्पीड़न का सिलसिला

महिलाओं की यौन उत्पीड़न का सिलसिला

अपना वजूद तलाशने के लिए घर की देहरी से बाहर कदम रखते हीं स्त्री क़ो तरह - तरह की मुश्किलों का सामना करना पड़ता है, पुरुष प्रधान समाज में वह खुद क़ो हर पल असुरक्षित पाती है. अपने पैरों पर खडे होने की उसकी ख्वाहिश की राह में दर्जनों घूरती आँखें आ ख़डी होती है. पशु भी शायद एक दूसरे के प्रति इतने पाशविक नहीं होते, जितना मनुष्य कभी - कभी हो जाता है. जानवर अपनी जाति का शोषण नहीं करते, उनकी रक्षा का धर्म निभाते हैं . लेकिन इंसान दूसरे क़ो यातनायें देने में कभी नहीं हिचकते. यहीं कारण है कि दुनिया में इस समय मानव तस्करी जैसी घृणित व्यापार सबसे तेजी से बढ़ता जा रहा है. इस कारोबार में महिलाओं की हालत सबसे दयनीय है. हमारे देश में महिलाओं की तस्करी की भयावह तस्वीर इसलिए भी उभरी है कि यहाँ उनके ऊपर कई तरह की सामाजिक हदबँदियाँ लागू है. किसी समाज में मनुष्य और उसकी कमजोरी का अंदाजा लगाना हो तो उसमें महिलाओं की स्थिति क़ो देखना चाहिए . मानव तस्करी के महिलाओं पर पड़ने वाले प्रभाव बहुत दर्दनाक और इंसानियत क़ो शर्मसार करने वाले हैं. महिलाओं की तस्करी अब जघन्य अपराध का रूप ले चुकी है. यह अपराध मानवता क़ो तार - तार करने वाला है. भारत में तो इसका स्वरूप इतना भयावह हो चूका है कि इंसानियत अपना चेहरा छीपा ले. आज भारत मानव तस्करी का प्रमुख अड्डा बनता जा रहा है. यहाँ एक तरफ तो महिलाओं के लिए योजनाओं की बाढ़ - सी नजर आती है, मगर दूसरी ओर ऐसे हालत बना दिए गए हैं कि उन्हें देह व्यापार में लिप्त होना पड़ता है. उनका शारीरिक शोषण रुकने का नाम नहीं ले रहा है. यह हमारे समाज में व्याप्त महिलाओं और पुरुषों के बीच असमानता का सूचक है. सूचक है कि महिला का शरीर आज के सभ्य कहे जाने वाले समाज में भी बिकाऊ और शोषण की कार्यशाला का एक विषय बन चूका है. दुनिया में दस से बीस वर्ष आयु वर्ग की लड़कियों की तस्करी सबसे अधिक होती है ऐसा क्या हो जाता है कि ये महिलाएं अपने आप क़ो पलायन के बाद देह मंडी में खड़ा पाती है. विशेषज्ञयों की मानें तो ग़रीबी, भुखमरी, सामाजिक भेदभाव और महिलाओं क़ो लेकर समाज की निष्क्रिय मानसिकता इसके प्रमुख कारण है. बेरोजगारी और परिवार की खातिर दो जून की रोटी जुटाने के लिए ये महिलाएं अपना घर छोड़कर किसी भी अजनबी शहर में अपनी सुरक्षा क़ो दांव पर लगा कर पहुंच जाती है. फिर यहीं से शुरू होता है इनके शोषण और पतन का सिलसिला. इसी जीवन - यापन के संघर्ष में वे अपने आपको कई बार जिस्म के बाजार में ख़डी पाती है. हमने तरक्की की सीढ़ियां तो चढ़ ली है, लेकिन शायद इस प्रक्रिया में हमने मानव जाति की जननी क़ो हीं पीछे छोड़ दिया है. महिलाएं समाज के हाशिये पर ख़डी है और हमारे सभ्य समाज पर सवालिया निशान लगाती नजर आती है. अगर हम अपने आप क़ो विकसित समाज या सभ्य समाज कहते हैं तो विकास का यह फल महिलाओं तक पहुंचना जरूरी है. नौकरी गँवाने का डर या फिर अनुचित व्यवहार की आशंका कुछ महिलाओं क़ो हालात के सामने समर्पण करने क़ो मजबूर कर देती है ऐसे में वे गलत हरकतों का विरोध करने के बजाए उन्हें बर्दास्त करने और अवांक्षित मांगो की पूर्ति के लिए राजी हो जाती है. चुंकि पीड़िता क़ो लग सकता है कि गलत मांगों क़ो मानने के आलावा उसके पास कोई चारा नहीं है, वे प्रतीकार के डर से गलत संबंधों क़ो स्वीकार भी लेती है. तरुण तेजपाल तहलका पत्रिका के सम्पादक के हाई प्रोफाइल मामले में साथी कर्मचारी (पत्रकार ) ने यौन उत्पीड़न की शिकायत दर्ज कराई, तरुण तेजपाल ने इसे नशे में की गई चुहल बताया और इसमें पीड़िता की सहमति क़ो भी दर्शाया है, लेकिन इससे अनेक सवाल उठते हैं. इसके पीछे क्या मानस था और वह भी अपनी बेटी की दोस्त के साथ इस तरह के व्यवहार का क्या, यह इसलिए हुआ की वह शराब के नशे में चूर थे या उनके मन में वासना थी? या फिर सत्ता के मद में चूर होने के कारण यह सभी हुआ? जिस प्रकार समाज में भ्र्ष्टाचार के लिए भौतिक सम्पदा और ताकत महत्वपूर्ण कारण है. सम्पति जुटाने के लिए किसी भी हद से गुजर जाना हमें हमारी स्व से काट देता है. इसी प्रकार महिलाओं के प्रति वासना हमें हमारी आत्मा से काट देती है. धन, सत्ता, और शक्ति पाकर ऐसा कौन है जिसे अहंकार न हुआ हो. तहलका यौन उत्पीड़न मामले के प्रकाश में आने के बाद कार्य स्थलों पर महिलाओं की सुरक्षा का सवाल विमर्श के केंद्र में है. सवाल पूछा जा रहा है कि कानूनी प्रावधानों के बावजूद महिलाओं का उत्पीड़न रुक क्यों नहीं रहा है. ऐसे सभी छोटे बड़े, सरकारी, गैर सरकारी संस्थान जहाँ पर भी महिलाएं कार्यरत है, भले उनकी संख्या पांच - छह हीं क्यों न हो, वहाँ पर सेक्सुअल हरासमेंट ऑफ़ वीमेन एक्ट वर्क प्लेस (प्रिवेशन, प्रोहिवेशन एंड रिड्रेशल एक्ट 2013 ) लागू होता है, 1977 में विशाखा केस पर आए सुप्रीम कोर्ट के दिशा - निर्देशों के आधार पर अब जाकर यह एक्ट बना है.लेकिन अधिकतर कार्यस्थलों में इस गाइडलाइन के आधार पर समिति बनाई हीं नहीं गई. महिलाओं क़ो भी इसके बारे में कोई जानकारी नहीं है. यौन - उत्पीड़न के दायरे में शारीरिक छेड़छाड़, शारीरिक स्पर्श करना, यौन आग्रह करना, महिला सहकर्मी क़ो पोर्न दिखाना, अन्य तरह से आपत्तिजनक बात करना या व्यवहार करना या फिर इशारा करना शामिल है. प्रत्येक दफ्तर में एक शिकायत समिति होगी जिसकी प्रमुख महिला होगी, समिति में महिलाओं की संख्या आधे से कम नहीं होनी चाहिए ये अंम्प्लॉयर क़ो सुनिश्चित करना होगा. देश - समाज में महिलाओं के साथ बराबरी के व्यवहार के मामले में भारत का हिसाब खराब है. ताज़ा वैश्विक सूची में भारत की स्थिति पिछले साल की तुलना में थोड़ी जरूर सुधरी है पर देश अब भी विश्व में ऊपर से 101 वें स्थान पर है. स्त्रियों के राजनैतिक सशक्तिकरण के मामले में भारत जहाँ नौवे स्थान पर है वहीं स्वास्थ्य और उत्तरजीवीता के लिहाज से 135 वें पर है. आर्थिक भागीदारी और अवसर के लिहाज से 124 वें और शैक्षणिक उपलब्धियों के हिसाब से 120 वें स्थान पर है. राजनितिक सशक्तिकरण में भारत क़ो उच्च स्थान राष्ट्रध्यक्ष पद (राष्ट्रपति ) पर एक महिला के विराजमान होने की वजह से मिला. क्योंकि संसद में महिलाओं की भागीदारी और मंत्री पद पर महिलाओं के आसीन होने जैसी श्रेणीयों में भारत अब भी बहुत से देशों की तुलना में काफ़ी पीछे है. भारत 2022 में सूची में 105 वें स्थान पर था, भारत के संबंध में विश्व आर्थिक मंच ने कहा कि भारत स्त्री - पुरुष समानता के संबंध में ठोस प्रगति का प्रदर्शन करने के लिए अभी भी संघर्ष कर रहा है.

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