बिहार का निज़ाम बिहार क़ो किया बेजाम

बिहार का निज़ाम बिहार क़ो किया बेजाम

 शराब का संबंध सभ्यता के विकास से रहा है. हर समाज में शराब क़ो लेकर खास तरह के आग्रह और दुराग्रह रहे हैं. मुग़ल शासक औरंगजेब ने अपने - शासनकाल में शराबबंदी लागू की थी. लैरी कॉलिंस और डोमिनिक लेपियरे की किताब माउन्टबेटेन एंड दी पार्टीशन ऑफ़ इंडिया में भी कई जगह इस बात का जिक्र है कि औपनिवेशिक भारतीय समाज में शराब स्वीकार्य नहीं होने के कारण अंग्रेजी हुक्मरानों क़ो किस तरह की समस्याओं का सामना करना पड़ता था. 1844 में पिलग्रिम ने लिखा है की " अल्मोड़ा के प्रसिद्ध व्यापारी कशी शाह के यहाँ सब कुछ मिलता है पर शराब , बियर और स्पिरिट नहीं बिकती है इसकी पुष्टि 1856 से 1884 तक कुमाऊँ के आयुक्त रहे ब्रिटिश सेना के लेफ्टिनेंट जनरल हेनरी रेमसे के कथन से भी होती है कि ' कुमाऊँ के ग्रामीण इलाकों में शराब का प्रयोग नहीं होता है और मुझे आशा है की कभी नहीं होगा. मुख्य शहरों के आलावा शराब की दुकानेँ नहीं खुलने दी जाएगी. लेकिन सर रेमसे की कथनी और ब्रिटिश हुकूमत की करनी में बड़ा फर्क रहा. जैसे - जैसे अंग्रेज फ़ौज ने पहाड़ों में अपने कंटोनमेंट बनाने शुरू किए शराब का प्रचलन भी बढ़ता गया. ब्रिटिशराज में 1879 - 80 के दौरान पहाड़ में पहली बार सरकारी शराब की दुकान खुली थी . 1925 के अपने सम्पादकीय में अल्मोड़े से प्रकाशित होने वाले समाचार पत्र ' जिला समाचार अल्मोड़ा ' ने इस शराबखोरी पर तीखी टिप्पणी की थी. उसने लिखा,'..... कुमाऊं प्रान्त में दिन पर दिन शराब का प्रसार बढ़ रहा है. नब्बे फीसद लोग इसके दास बन चुके हैं. सरकार अपनी आमदनी नहीं छोड़ सकती और दुकानदार अपनी रोजी. तो क्या लोग अपनी आदत नहीं छोड़ सकते ? सरकार क़ो लानत है कि वह सिर्फ आबकारी रेवेन्यू की प्राप्ति के लिए इसे शह दे रहि है. आजादी के बाद की कॉंग्रेसी सरकारों ने शराब क़ो राजस्व प्राप्ति के लिए विशेष रूप से उपयोगी पाया. बाद में, तो जनता पार्टी शासन के ढाई वर्ष छोड़कर सभी सरकारों ने इसे कमाई का महत्वपूर्ण साधन मान इसे गाँव - गाँव पहुंचाया. शराब ने सबसे ज्यादा महिलाओं के जीवन क़ो प्रभावित किया है. इसलिए जब - जब इसके खिलाफ आंदोलन होते हैं , महिलाएं बढ़ - चढ़ कर हिस्सा लेती है. शराबबंदी की बात करने के साथ हीं उपयोगितावाद और व्यक्तिवाद के दायरे में बहस का सिलसिला शुरू हो जाता है. आजादी के कुछ समय बाद से हीं सत्ता और शराब की कॉकटेल का प्रभाव या नशा हमारे पुरे सिस्टम पर हावी होने लगा था. इसे समझने के लिए एक ही उदाहरण काफ़ी है. 1970 के आस - पास मुरादाबाद में सरकारी ठेके के दुकान के सामने खाने का ठेला लगाने वाले अपने पिता की मदद करने वाला एक वच्चा इसी शराब की बदौलत मात्र तीन दशक के भीतर साठ हज़ार करोड़ की अकूत सम्पदा का मालिक बन गया. तमिलनाडु, मिजोरम, हरियाणा, नागालैंड, मणिपुर, लक्ष्यद्वीप, कर्नाटक शराबबंदी तो लागू की, लेकिन सरकारी खजाना खाली होते देख यह पाबंदी हटा दी गई. चाँद पर बस्ती बसाने का सपना देखने जा रहा भारत में शराबबंदी एक ऐसा कसरत है, जिसे शुरू करने के बाद हर राज्य सरकार का दम फूलने लगता है. बिहार में मिले जनादेश से अभिभूत मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने सत्ता सँभालने के एक हफ्ते के अंदर शराबबंदी की घोषणा कर दी थी. लेकिन शराबबंदी के मामले में हरियाणा का नुस्खा काफ़ी भयावह तस्वीर की याद दिलाने वाला है. जब बंसीलाल हरियाणा के मुख्यमंत्री थे , तब उन्हें दो साल के भीतर शराबबंदी के अपने फैसले क़ो पलटना पड़ा था. उस समय उनकी सहयोगी भाजपा ने उन्हें मझधार में छोड़कर 1999 में पूर्व मुख्यमंत्री ओमप्रकाश चौटाला का हाथ थाम लिया था. अब बिहार पर नजर डाल लेते हैं. यह सच है की बिहार में महिलाएं, खासतौर पर दलित वर्ग की महिलाएं मुख्यमंत्री से यह शिकायत करती रही है कि शराब ने उनका घर बर्बाद कर दिया है, इसलिए राज्य में शराब पर प्रतिबंध लगाया जाए. लेकिन शराब से करीब 3000 करोड़ से भी ज्यादा का राजस्व कमाने वाली सरकार के हाथ - पैर इसके ख्याल से ही फुल जाते थे.यों बिहार से पहले आंध्राप्रदेश, तमिलनाडु, मिजोरम और हरियाणा में शराबबंदी का प्रयोग नाकाम हो चूका है. आंध्र में मुख्यमंत्री चंद्रबाबू नायडू ने यह कह कर शराबबंदी हटा दी थी कि इसे पूरी तरह लागू कर पाना संभव नहीं. एक लम्बे समय बाद बंसीलाल ने भी यहीं बात दुहराई की यह संभव नहीं. बिहार में कहने क़ो तो शराबबंदी लागू है लेकिन शराब की डिलेवरी घर तक हो रहा है बड़े पैमाने पर. अगर शराबबंदी से राजस्व का नुकसान भूल भी जाएँ तो, आज बिहार में शराब से सम्बंधित मुकदमे से न्यायलय का कीमती वक्त इसमें जाया हो रहा है, जिसका असर अन्य मुकदमों की देरी के रूप में पड़ रहा है. दरअसल , बिहार में फिलहाल नीतीश कुमार की स्थिति कमोबेश वहीं है जो हरियाणा में एक समय बंसीलाल की थी. हरियाणा में बंसीलाल अगर ' विकास पुरुष ' थे तो बिहार में नीतीश कुमार ' विकास कुमार ' हैं. पिछले कार्यकाल में पंचायत स्तर पर भी शराब की दुकानेँ खोलने का ' श्रेय ' भी नीतीश क़ो ही जाता है. आइए शराबबंदी के मामले में दूसरे राज्यों के हालात के बारे में जानें की किस राज्य में इसका क्या हालात है --- महात्मा गाँधी की जन्मभूमि रहे गुजरात में कोई भी सत्ताधारी दल शराब - बंदी से पाबंदी हटाने की सोंच भी नहीं सकता. लेकिन जहाँ चाह, वहाँ राह की तर्ज पर गुजरात में ऐसा मर्ज खोजा गया है, जिसका ईलाज मदिरा से ही हो सकता है. सूबे में 1960 से शराबबंदी है. लेकिन वहाँ लगभग 60 हज़ार से ज्यादा ऐसे लोग हैं जिनके पास शराब खरीदने और पीने का परमिट है. राज्य में प्रोहेविशन विभाग से परमिट लेकर सिविल अस्पताल के डॉक्टर से वैसी बीमारी का सर्टिफिकेट लेना पड़ता है जो सिर्फ शराबपीने से ही ठीक हो सकती है. और जिनके पास शराब पीने के लिए हेल्थ परमिट नहीं है उनके लिए सूबे से सटे दमन और दीव व राजस्थान से तस्करी कर मंगाई गई शराब तो है हीं. बिहार में भी नीतीश कुमार के राज्यसभा सदस्य बन जाने के बाद गुजरात के तर्ज पर हीं हेल्थ कार्ड के आधार पर शराब पीने की छूट मिल सकती है सूत्रों की अगर माने तो बीजेपी के मुख्यमंत्री बनने पर ऐसा निर्णय लिया जा सकता है. क्योंकि आखिर शराब तो बंद है नहीं, उल्टे राजस्व का नुकसान हो रहा है, तस्करी बढ़ गया है, दूसरे न्यायलय पर मुकदमों का बोझ बढ़ती जा रही है.

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