बैंड - बाजा, बंदूक और सामंती सोंच

बैंड - बाजा, बंदूक और सामंती सोंच

देश के कई हिस्सों में ख़ुशी में फायरिंग का चलन काफ़ी तेजी से बढ़ रहा है. तमाम कायदे - क़ानून होने के बावजूद इस पर लगाम न लग पाना चिंता की बात है. हाल में बिहार के रोहतास जिले के दिनारा थाना क्षेत्र के गंगाढ़ी गाँव में शादी का माहौल उस रात मातम में बदल गया. शादी में अपने ताकत के प्रदर्शन व वर्चस्व क़ो लेकर फायरिंग की जाति है. इस अधिवक्ता के मौत के बाद इस मुद्दे पर बहस तेज हो गई है. इस सामंती नुमाइश का जायजा ले रहे हैं अनुराग भारत मीडिया ग्रुप के प्रधान सम्पादक शिवाजी चौधरी. शादी यानि ढ़ोल, नगाड़ा, बारातियों का बेसुध नाचना, हंगामा, ठिठोली, रस्मो - रिवाज़ और बहुत सारी मस्ती. अरे शादियों में एक - दो और जरूरी आइटम तो भूल हीं गए - शराब , असलहे यानि बंदूक, रायफल, रिवॉल्वर पिस्टल से फायरिंग. लाइसेंसी नहीँ है तो गैर लाइसेंसी तो है हीं. बारात है तो फिर वह भी तो चाहिए - न - बोतल सोतल - दारू - सारु, नशा - वासा. शक्ति प्रदर्शन की न जाने कौन सी मानसिकता इस तरह की आत्मघाती परम्पराओं क़ो क़ायम रखे हुए है? नकली रोब दिखाने का मंसूबा तब तक पूरा होता नहीं दीखता जब तक ख़ुशी के मौकों पर फायरिंग न हो. भले हीं कोई ढेर हीं क्यों न हो जाए. कभी - कभी तो ' तमंचे पर डिस्को ' ने शादी के सरताज तक क़ो नहीं बखशा है. इस नुमाइशी शौक ने तो कई बार दूल्हा - दुल्हन का हीं काम तमाम कर दिया है. शादी - विवाह या दूसरी ख़ुशी के अवसरों पर होने वाली फायरिंग से सैकड़ों घर उजडे हैं. देश के हर कोने से विवाह के मौके पर शक्ति प्रदर्शन की वजह से कइयों की मौतें हुई है और न जाने कितने घायल हुए हैं. बरातों की ख़ुशी क़ो पल भर में मातम में बदलते देखा गया है. हथियारों का शौक इतना गहरा है कि इससे हमारे साधु संत भी नहीं बचे हैं. घर संसार का मोह छोड़ चुकी साध्वी भी जब वर वधू क़ो आशीर्वाद देने पहुंची तो फायरिंग कर दी, जिससे तीन चार घर उजड़ गए. बिहार, हरियाणा, उत्तरप्रदेश, पंजाब जैसे राज्यों में तो शादियों में जो जितने राउंड गोली चलाता है वह उतना हीं ताकतवर माना जाता है. इसी ताकत के प्रदर्शन में सैकड़ों राउंड गोली चलाना फैशन बन गया है. पंजाब के बठिंडा में शादी के दौरान एक गोली चली और गर्भवती डांसर कुलविंदर कौर की मौत हो गई. कुलविंदर कौर, अधिवक्ता तिवारी शादियों में चलाई जा रही गोलियों की न तो पहली शिकार है न आखिरी. कुलविंदर से पहले भी तमाम लोग इस तरह की घटना के शिकार हुए हैं और अगर प्रशासन अब भी नहीं चेतता है तो लोग शिकार होते रहेंगे. हरियाणा के करनाल में तो अखिल भारतीय हिन्दू महासभा की राष्ट्रीय उपाध्यक्ष साध्वी देवा ठाकुर एक शादी समारोह में गई थी. वहाँ साध्वी और उसके सुरक्षा गार्ड ने फायरिंग की. इसमें एक व्यक्ति की मौत हो गई और चार घायल हो गए थे. अहम सवाल है कि असलहा ( हथियार ) आज शादियों में इतना महत्वपूर्ण हो गया है ? क्यों और कब यह हमारे परिवारों और खुशियों का अहम हिस्सा बन गया है ? क्या शादियों में हथियार लहराए बिना शादियां नहीं हो सकती ? इन सवालों क़ो समाजशास्त्री सीधे तौर पर बाजारवाद से जोड़ते हैं. समाजवीज्ञानियों का कहना है कि असलहों का प्रदर्शन समन्तवाद से प्रभावित है. ये देन भी सामंतवाद की हीं है. शक्ति प्रदर्शन पुराने जमाने में जरूरी होता था राजे - रजवाड़े के यहाँ शादी विवाह के मौकों पर प्रशिक्षित तलवार बाज आते थे. बदलते समय के साथ तलवार की जगह रायफल, बंदूक रिवॉल्वर ने ली. सुप्रीम कोर्ट ने 2013 में शादी - विवाह आदि ख़ुशी के अवसरों पर फायरिंग क़ो गैरकानूनी घोषित कर दिया था, लेकिन न तो इस पर पुलिस का ध्यान है न हीं प्रशासन का. यहीं वजह है की कई राज्यों में जहाँ सामंती मानसिकता और दबंगई सिर चढ़ कर बोलती है, वहाँ शादी - विवाह तो छोड़िए, हर बात पर असलहों का प्रदर्शन किया जाता है. और बड़े हादसे के बाद पुलिस हाथ मलती नजर आती है. आजादी के बाद समाज में डकैतों आदि का खतरा होता था, तब सरकारों ने आत्मरक्षा के लिए असलहों के लाइसेंस थोक के भाव जारी किए. लेकिन अब जब पुलिस सक्षम है, ऐसे समय में घर - घर में असलहे रखने का कोई तुक नहीँ है. इस पर लगाम लगाए जाने कि जरूरत है, हालांकि हाल हीं में बिहार में पंचायत स्तर या किसी भी जनप्रतिनिधि क़ो बिहार सरकार प्राथमिकता के तौर पर हथियार लाइसेंस देने की बात कही है जो ठीक नहीँ है इससे अपराध और घटनाएं बढ़ेगी दूसरी तरफ पुलिस के कार्यप्रणाली पर सवाल खडे होंगे. किसी भी किस्म की हर्ष फायरिंग पुरे देश में मना है. फिर भी यह रुक नहीं रही. हथियार पास में रखने और शादी - विवाह में फायरिंग क़ो मनोचिकित्साक एक अलग नजर से देखते हैं. उनका मानना है कि बाजारवाद, दबंगई और फिल्मों ने इसे खूब बढ़ावा दिया है. उसे फैशन में शामिल कर दिया है. बात - बात पर तमंचा निकालना - ताकतवर होने की फैशन की निशानी बना दिया गया है. बिहार, उत्तरप्रदेश और पंजाब जैसे राज्यों में तो स्थानीय भाषाओं में बजाए जाने वाले गानों में तमंचे क़ो लेकर कई गाने बनाए गए हैं. इससे युवा वर्ग भी प्रभावित होता है. यहाँ तक की वॉलीवुड में भी ' तमंचे पर डिस्को ' जैसे गाने लोगों क़ो खूब आकर्षित करते रहे हैं. और जब भी समारोहों में गाने बजाए जाते हैं तो डीजे से पहली फरमाइश तमंचे पर डिस्को जैसे गानों की हीं होती है. सुप्रीम कोर्ट की एक वकील का मानना है कि राज्य सरकारों क़ो हथियारों की लाइसेंस जारी करने में सख्ती बरतनी चाहिए और साथ में गैरकानूनी असलहों की भी छानबीन करनी चाहिए. गैरकानूनी असलहों का धंधा भी काफ़ी बढ़ गया है. इसे नियंत्रित करने की जरूरत है. समय आ गया है कि भारत - सरकार और राज्य सरकारें रेडियो और टीवी, प्रिंट मीडिया की माध्यमों से इस बारे में जनजागरूकता अभियान भी चलाएं. ख़ुशी की मौकों पर शिकंजा न कस पाने की वजह यह भी है कि पुलिस इस बारे में कोई पूर्वांनुमान नहीं लगा पाती उसे कोई जानकारी तभी होती है, जब घटना घट जाती है. एक व्यवहारिक समस्या यह भी है कि अगर किसी की बारात आदि में पुलिस हथियारों के बारे में जाँच - पड़ताल करना भी चाहे तो इससे नई किस्म की सामाजिक समस्या ख़डी हो जाएगी. ऐसे मौकों पर घराती और बाराती दोनों पक्ष पुलिस पर हीं अपमानित किए जाने का आरोप लगाकर हंगामा खड़ा कर सकते हैं. इसलिए जागरूकता हीं बेहतर उपाय हो सकता है. शिवाजी चौधरी, प्रधान सम्पादक, अनुराग भारत मीडिया ग्रुप, सम्पर्क : 9334375496

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