पानी पर पूंजीपतियों का पहरा
पानी पर पूंजीपतियों का पहरा , पुरे देश में शुद्ध पेय जल क़ो लेकर संकट गहराता जा रहा है. कुछ इलाकों में भूजल का स्तर इतना नीचे चला गया है कि वहाँ से पलायन हो रहा है, तो कहीं बाढ़ की विभीषिका से लोग तबाह हैं. हाल के वर्षों में, बाजारवादी शक्तियों ने पानी क़ो एक पण्य - वस्तु बना दिया है, जिससे समस्या और बढ़ गई है. पानी क़ो लेकर एक नए किस्म की सियासत भी उभरी है. मूल्य निर्धारण, माँग और आपूर्ति, यह शब्दावली कारोबार की है. कारोबार राज्य करे या कॉरपोरेट कम्पनियाँ. कारोबार की वजह से बहुत सारी मुश्किलें पैदा हुई है. लेकिन, इससे अलग भी कुछ समस्याएं हैं. जैसे पेयजल की किल्ल्त , बढ़ता जल प्रदूषण और उससे होने वाली महामारियां. जिस तरह से विश्व बैंक जैसी संस्थाएं नवउदारवादी ( जो वास्तव में निजीकरण का सुधारा हुआ नाम है ) की नीति क़ो जल के क्षेत्र में फलने - फूलने के लिए अवसर मुहैया कर रही है , वह भविष्य के लिए खतरे की घंटी है. संविधान के अनुच्छेद - 21 में प्रत्येक नागरिक क़ो जीने के अधिकार की मान्यता दी गई है. लेकिन जीने की मूलभूत सुविधाएं क्या हो ? इनके औचित्य क़ो तय करने वाले न तो बिंदु तय किए गए और न हीं उन्हें बिंदुवार परिभाषित किया गया. इसीलिए अब तक जल, भोजन, आवास, स्वास्थ्य , और शिक्षा जैसे जीने के लिए बुनियादी वस्तुएँ पूरी तरह संवैधानिक अधिकार हासिल कर लेने से वंचित है. 2002 में अटल बिहारी वाजपेयी सरकार ने औद्योगिक हितों क़ो लाभ पहुंचाने वाली - जल नीति ' बनाई थी और पेयजल के दोहन का व्यापार करने की छूट देशी और विदेशी निजी कम्पनियों क़ो दे दी गई. भारतीय रेल भी ' रेल नीर ' नामक उत्पाद लेकर बाजार में आई. इस कारोबार की शुरुआत छतीसगढ़ से हुई थी. यहाँ शिवनाथ नदी पर देश का पहला बोतल बंद पानी का संयन्त्र स्थापित किया गया. इस तरह एक तरफा क़ानून बनाकर मानव समूहों क़ो जल के सामुदायिक अधिकार से अलग करने का सिलसिला चल निकला. यह सुविधा यूरोपीय संघ के दबाव में दी गई थी. पानी क़ो विश्व व्यापार के दायरे में लाकर पिछले एक - डेढ़ दशक के भीतर एक - एक कर विकासशील देशों के जलस्रोतों क़ो खुले दोहन के लिए इन कम्पनियों के हवाले कर दिए गए. विकसित पश्चिमी देशों के लिए इसी यूरोपीय संघ ने पक्षपाती मानदंड अपनाकर ऐसे नियम - क़ानून बनाए कि विश्व के दूसरे देश पश्चिमी देशों में आकर पानी का कारोबार न करने पाएं. यह संघ विकासशील देशों के जल का अधिकतम दोहन करना चाहता है जिससे इन देशों की प्राकृतिक सम्पदा का जल्द से जल्द नकदीकरण कर लिया जाए. क्योंकि अब पानी केवल पेय और सिंचाई - जल मात्र नहीं रह गया है , बल्कि विश्व बाजार में ' नीला सोना ' के तौर पर तब्दील हो चूका है. भारत समेत दुनिया में जिस तेजी से आबादी बढ़ रही है और जलस्रोतों के घटने के साथ उनका निजीकरण हो रहा है , उतनी हीं चालाकी से पानी के लाभ का बाजार तैयार किया जा रहा है , जिससे एक बड़ी आबादी क़ो जीवनदायी जल से वंचित कर दिया जाए और आर्थिक रूप से सक्षम व्यक्ति ही जलउपभोक्ता बन सकें. यहीं कारण है की दुनिया में पचास हजार 500 अरब डॉलर कापानी का कारोबार हो गया है. मसलन पानी का हर बूंद बिकने लगी है और हर घूंट पानी की कीमत वसूली जाने लगी है. भारत में पानी और पानी क़ो शुद्ध करने के उपकरणों का बाजार लगातार फ़ैल रहा है. देश में करीब पचासी लाख परिवार से ज्यादा परिवार जल शोधित ( प्युरिफायर )उपकरणों का प्रयोग करने लगे हैं. इस बाजार पर युरेका फोरब्स का कब्जा है करीब अस्सी लाख घरों से ज्यादा में इसी का इस्तेमाल किया जाता है. भारत दुनिया में भूजल का सबसे बड़ा उपभोक्ता देश है यहाँ हर साल 230 घन किलोमीटर पानी धरती के गर्भ से खिंचा जाता है , जो विश्व की कुल खपत के एक चौथाई से भी ज्यादा है. इस पानी की खपत साठ फीसद भूजल के स्रोत अधिकतम दोहन की श्रेणी में आकर सूखने के कगार पर हैं --- औद्योगिक इकाइयों के लिए पानी का बढ़ता दोहन इन स्रोतों से हालात और नाजुक बना रहा है. हालांकि नागरिक समाज पानी पर अपने अधिकार क़ो लेकर सजग है , लेकिन असल समस्या यह है कि राज्य उसे समर्थन नहीँ दे रहा है. भारत में पानी की कहानी क़ो लेकर तीखा अंतर्विरोध है. सरकार एक तरफ तो जल संरक्षण का दावा कर रही है. दूसरी तरफ , पीछे के दरवाज़े से इसके बाजारीकरण और निजीकरण क़ो बढ़ावा दे रही है. आज भारत की अधिकांश नदियां बेहद प्रदूषित हो चुकी है और उनके जल पीने के लिए तो दूर की बात है, दूसरे प्रयोगों के लिए भी सही नहीं है . आज तक किसी उद्योग क़ो बंद करने या उनपर पाबंदी लगाने की बात सुनने क़ो नहीं मिलती. हाल के समय में ' कॉर्पोरेट सोशल रिस्पॉन्सबिलिटी ( सीएसआर ) के सिद्धांत ने समस्याओं क़ो सुलझाने के बजाए और नए तरह से उलझा दिया है. इसके अनुसार व्यावसायिक संगठनों क़ो देश के आर्थिक विकास के साथ स्थानीय समुदायों और पर्यावरण के प्रति अपने दायित्व का निर्वाह करना होता है. बहुराष्ट्रीय कम्पनीयाँ न केवल हमारे दैनिक जीवन क़ो प्रभावित कर रही है बल्कि इनके द्वारा पर्यावरण की हो रही क्षति और इनके दूरगामी प्रभाव भी अनंत हैं. इसी तरह, के कई अन्य उदाहरण जैसे नियमगिरी में आदिवासियों द्वारा वेदांता कम्पनी का विरोध, विशेष आर्थिक क्षेत्र के विरुद्ध कई संघर्ष देखने क़ो मिलते हैं. बढ़ती हुई जनसंख्या की जरूरतों क़ो पूरा करने के लिहाज से शुद्ध पेयजल की कमी है. पेयजल की समस्या भी नगरीय समाज और ग्रामीण समाज में अलग - अलग तरह से है. ग्रामीण भारत में तालाब, कुआँ आदि किसी की निजी सम्पति भले होते थे, लेकिन उन पर सभी अधिकार होता था. मंदिरों आदि के बाहर राहगीरों के लिए पीने का पानी पहले की तुलना में काफ़ी कम लेकिन फिर भी गाहे बगाहे देखने क़ो मिल जाता है.
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