नक्सल मुक्त भारत
केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह ने 30 मार्च क़ो संसद में बताया कि छतीसगढ़ के बस्तर जिले से नक्सलवाद के खात्मे की समय - सीमा 31 मार्च, 2026 तय की थी. याद कीजिये करीब डेढ़ दशक पहले तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने नक्सलवाद क़ो देश के, ' आंतरिक सुरक्षा एवं विकास के लिए बहुत बड़ा रोड़ा माना था. केंद्र की सशक्त सरकार 2014 से हीं आंतरिक सुरक्षा क़ो लेकर नक्सलवाद का रीढ़ तोड़ने के लिए सुरक्षा बलों क़ो विशेष छूट प्रदान किया एवं आधुनिक उपकरणों से लैस कर नक्सलीयों पर दबाव बनाया. नक्सली अब समझ गए या तो समर्पण कर जान बचाना होगा अन्यथा मारा जाना तय है. हालांकि किसी भी संगठन या विचार के बारे में यह दावा करना की पूरी तरह खत्म हो गया है बेईमानी होगा,लेकिन उसका रहना ना रहना कोई मायने नहीँ रखता है क्योंकि जब नक्सलवाद अपने चरम पर था, तब इसके हजारों कैडर थे.
शिवाजी चौधरी, प्रधान सम्पादक, अनुराग भारत मीडिया ग्रुप, सम्पर्क : 9334375496
आज इनकी संख्या बमुश्किल सैकड़ों में सिमट कर रह गईं है. वे भी ऐसे नक्सली होंगे, जिनकी सांगठनिक अहमियत शायद हीं हो. नक्सलवाद का गढ़ छतीसगढ़ का बस्तर जिला रहा है. इसे केंद्र में रखकर देखें तो ओड़िशा, तेलंगाना, महाराष्ट्र, उत्तरप्रदेश, बिहार, एवं झारखण्ड जैसे तमाम राज्यों के इलाके इसके प्रभाव से प्रभावित थे. पड़ोसी देश नेपाल में भी वामपंथी आंदोलन सक्रिय था जिसके कारण ' पशुपति से तिरुपति तक लाल गलियारा बनाने का ' नारा खूब प्रचलित हुआ करता था. अब इस लाल कॉरिडोर का कोई नामलेवा नहीँ है. नेपाल में तो नक्सलीयों ने बजापते अपना राजनितिक दल बना लिया था. हालांकि इस बार के चुनाव में जनता ने भी इनको नकार दिया है. दरअसल 2014 से हीं मोदी सरकार के आने के बाद रणनीतिक बदलाव हुआ, जंगल के भीतरी भाग में हीं सुरक्षा बलों का कैंप लगाए गए. आज सीआरपीफ, बीएसएफ या स्थानीय डीजी गार्ड्स के शिविर घने जंगलों में भी देखे जा सकते हैं. यह रणनीति कमोबेश 2010 के दंतेवाडा नक्सली हमले के बाद हीं बनाई गईं, जिसमें नक्सलीयों ने 75 से अधिक सीआरपीफ जवानों की हत्या कर दी थी. यह घटना नक्सलवाद के खात्मे की प्रतिबद्धता के लिहाज से टर्निंग पॉइंट ' साबित हुई. इस हादसे के बाद सुरक्षा बलों के कैंप पूरी तेजी से जंगलों में लगने लगे, जिसके कारण नलसलियों क़ो नए रंगरूट भर्ती करने में परेशानी होने लगा. इसी दौरान, संगठन के मुख्य नेतृत्व क़ो या तो मार दिया गया या उसने आत्मसमर्पण कर दिया. पापाराव नाम का नक्सली एवं बिहार में नक्सलीयों ने हाल हीं में डीजीपी के सामने आत्मसमर्पण किया सम्भवतः ये आखिरी नेतृत्व है. इस तरह नक्सलवाद आंदोलन में अब जान नहीं है. नक्सलवाद - विरोधी रणनीति की एक खासियत सरकारों द्वारा सड़क व बुनियादी ढांचे की बेहतरी पर काम करना भी है. अब दूर - दराज के इलाकों में भी संचार नेटवर्क बढ़ा है जिसके कारण सुरक्षा बलों क़ो सूचना प्राप्त करने या कार्रवाई करने में भी सुविधा हुआ है.सुरक्षा बलों क़ो आधुनिक उपकरणों जैसे ' नाईट विजन डिवाइस ' के साथ - साथ अब वे ड्रोन का भी इस्तेमाल करने लगे हैं. सबसे पहले नक्सलवाद से प्रभावित छतीसगढ़ पुलिस का रूप - रंग बदला गया. अब सवाल यह उठता है कि अब आगे क्या? बेशक, अब भी नक्सलवाद प्रभावित इलाकों में देर रात्रि निर्भीक घूमना खतरे से कम नहीं है. लेकिन दिन के उजाले में यहाँ पर्यटकों की आवाजाहि क़ो बढ़ाया जा सकता है. दंडकरण्या का वर्णन रामायण में मिलता है जहाँ प्रभु श्रीराम के वनवास का केंद्र रहा था. इसको पर्यटक स्थल के रूप में विकसित किया जा सकता है, इस क्षेत्र का पौराणिक महत्व है. इसी तरह बचे - खुचे नक्सलीयों पर सरकार क़ो दबाव बनाकर रखना होगा. कोई भी चूक नक्सलीयों क़ो अपनी उपस्थिति दर्ज कराने का मौका दे सकता है. इसलिए सरकार क़ो इसपर ध्यान रखना होगा खनन क्षेत्र में सुरक्षा का पूरा प्रबंध रखना होगा, जेलों, व थानों की सुरक्षा भी बनी रहनी चाहिए, क्योंकि हथियारों की लूट की जा सकती है. पुनः एक बार कहना चाहता हुँ की विचार कभी नहीँ मरता हाँ, उसको बदला जा सकता है, उसको सही रास्ता दिखाया जा सकता है, उसको मुख्यधारा से जोड़ा जा सकता है.
0 Response to "नक्सल मुक्त भारत"
एक टिप्पणी भेजें