बिन पानी सब सून

बिन पानी सब सून

 दुनिया में मौजूद कुल पानी का तीन प्रतिशत हीं मनुष्यों के लिए उपयोगी है. हमारे पूर्वज इस सत्य क़ो पहचानते थे और इसीलिए रहीम जैसे कवि ने हमें सिख दी थी -- ' रहीमन पानी राखिए , बिन पानी सब सून. पानी गए न उबरै मोती -- मानुष -- चुन '. भगवान श्रीकृष्ण ने कहा था कि वाणी और पानी, दोनों का दुरूपयोग करने वाले सभ्यता, समय और समाज के शत्रु होते हैं. लेकिन श्रीकृष्ण क़ो पूजने वाले हमलोगों ने हीं पानी के दुरूपयोग क़ो न केवल अपनी आदत बना लिया है, बल्कि पानी के परम्परागत स्रोतों क़ो भी उपेक्षा के अँधेरे में धकेल कर असमय दम तोड़ने पर विवश कर दिया है. पानी के बिना जीवन कैसा होता है, यह उन भू - भागों के निवासियों से पूछिए, जहाँ अपनी जरूरत भर का पानी जुटाने के लिए लोगों क़ो कड़ा श्रम करना पड़ता है. देश के जो हिस्से परम्परागत रूप से जल संकट का सामना करते रहे हैं, उन हिस्सों में पानी की एक - एक बूंद क़ो बचा कर रखने या सहेजने के लिए जो चेतना पाई जाती है, हमें उस चेतना क़ो अपने स्वभाव का अंग बनाना होगा. क्या आप विश्वास करेंगे इस तथ्य पर की वुंदेलखंड में कई गाँव ऐसे हैं, जहाँ लड़कों की शादी इसलिए नहीं हो पा रही है क्योंकि गाँव में उपलब्ध जलस्रोत कुछ बरस पहले सूख गए और गाँव की महिलाओं क़ो जरूरत भर का पानी जुटाने के लिए तीन किलोमीटर दूर जाना पड़ता है. कोई भी पिता अपनी पुत्री क़ो ऐसे संघर्षो के चक्रव्यूह में नहीं धकेलना चाहता, जिनके समाधान की संभावना भी दूर - दूर तक दृष्टिगोचर नहीं होती. तेलंगाना के कुछ हिस्सों में चार सौ फुट गहरी खुदाई के बाद भी पानी इतना हीं आता है कि आधा घंटा मोटर चलाने के बाद आधी बाल्टी पानी भर सकें. पानी का रासायनिक सूत्र भले हीं हमें पता हो, लेकिन दुनिया के किसी भी प्रयोगशाला में हाईड्रोजन के दो अणु और ऑक्सीजन के एक अणु क़ी परस्पर क्रिया से पानी का उत्पादन संभव नहीं हो सका है. केवल प्रकृति है, जो पानी पैदा कर सकती है, और इसलिए बहुत जरूरी है कि हम पानी के महत्व क़ो समझें और उसका संरक्षण करें. यह धरती की सबसे मूल्यवान धरोहर है. एक अध्ययन रिपोर्ट के मुताबिक 2026 तक भारत जल संकटवाला वाला देश बन जाएगा.आर्थिक विकास की असलियत बताते अन्य आंकड़े ये हैं की प्रदूषित हवा की वजह से यूरोपीय देशों ने एक हीं वर्ष में 1.6 खरब डॉलर और छह लाख जीवन खो दिए. प्राकृतिक संसाधनों की उपलब्धता जितनी घटती जाएगी, विकास के सभी पैमाने हासिल करने की चीख - पुकार उतनी बढ़ती जाएगी . विश्व बैंक की ताज़ा रिपोर्ट भूजल संकट की और भी खतरनाक तस्वीर सामने रख रही है. इसमें चेतावनी दी गई है कि जलवायु परिवर्तन और अंधाधुंध जल दोहन का हाल यहीं रहा तो अगले एक दशक में भारत के साठ फीसद ब्लॉक् सूखे की चपेट में होंगे तब फसलों की सिंचाई तो दूर पीने के पानी के लिए भी मारामारी शुरू हो सकती है. राष्ट्रीय स्तर पर 5773 ब्लॉकों में से 1820 ब्लॉकों में जल स्तर खतरनाक पैमाना पार कर चुका है.जल संरक्षण न होने और लगातार दोहन के चलते दो सौ से अधिक ब्लॉक ऐसे भी हैं, जिनके बारे में केंद्रीय भूजल प्राधिकरण ने सम्बंधित राज्य सरकारों क़ो तत्काल प्रभाव से जल दोहन पर पाबंदी लगाने का सुझाव दिया है. भारत में संयुक्त राष्ट्र से पानी की समस्या के बारे में अध्ययन करने आए एक दल ने कई सुझाव दिए हैं . एक ब्रम्हापुत्र से फरक्का तक एक प्रणाली बना कर उसके पानी क़ो गंगा में मिला कर पानी की समस्या हल की जा सकती है. इसी तरह गंगा के पानी क़ो सोन नदी से लेकर एक नहर के जरिए कावेरी तक लाया जा सकता है. इससे जहाँ उत्तर से दक्षिण के लिए सस्ता संचार सुलभ होगा, वहाँ दक्षिण क़ो पर्याप्त पानी मिल जाएगा. इस तरह की नहर भारत की मुख्य नदियों क़ो जोड़ देगी, जिससे कुछ नदियों का विशाल और परेशान करने वाला जल भंडार काम में आ जाएगा. एक नहर चंबल क़ो राजस्थान नहर से बांध सकती है. इसके लिए नागौर पर बांध की आवश्यकता होगी. हम अभी तक समुद्र के खारे पानी क़ो भी पीने योग्य नहीं बना सके हैं, जबकि --- इजराइल अपनी पानी की सारी आवश्यकतायें समुद्र से पूरा करता है. इजराइल से समझौता कर हम यह तकनीक हासिल कर सकते हैं. हवा के बाद पानी पहली जरूरत है. इस काम क़ो सबसे अधिक प्राथमिकता दी जानी चाहिए. लेकिन अब तक हम ऐसा तंत्र विकसित नहीं कर सके हैं, जो हमारी पेयजल और सिंचाई योजनाओं क़ो ठीक से लागू कर सके बीते पंद्रह - बीस वर्षो से नदियों में पानी हर साल कम होता जा रहा है. हमारे नजदीक सोन नदी है गर्मी में इसकी हालत यह हो जाती है की एक वच्चा भी पार कर सकता है यह नदी धीरे - धीरे दम तोड़ रही है. वैज्ञानिक भी इस बात क़ो स्वीकार कर रहे हैं कि नदियों में पानी की मात्रा आगामी बीस वर्षो तक यों हीं घटती रही, तो देश में जलक्रांति की सम्भावना से इनकार नहीं किया जा सकता. नदी पर रिवर फ्रंट बनाने की योजना भी भविष्य के लिए घातक साबित हो सकती है. देश के दस राज्यों के 246 जिले पिछले साल से हीं सूखे की चपेट में है, जिनमें महाराष्ट्र के इक्कीस जिलों के 15,747 गाँव शामिल है. महानगरों से शुरू हुई पानी की किल्ल्त आज गाँव - गिराँव, खेत - खलिहान तक क़ो अपने चपेट में ले चुकी है. जरूरी है कि छोटे - छोटे प्रयासों से पानी क़ो जीवन दें, लाल कपड़े में लिपटे पानी के घड़े क़ो दिखने दें. ऐसा नहीं किया तो पानी के फेर में अब किसी के चेहरे पर ' पानी ' नहीं रह जाएगा. तब कैसे कहेंगे '' पानीदार समाज ' जब सड़क पर निकलें और गला सूखने पर पहले जेब क़ो तैयार करना पड़े, फिर पानी की बिक्री के ठिकाने ढूंढने पड़े! जहाँ बेहिसाब पानी बहाने पर लगाम का कोई इंतजाम करना किसी भी सरकार और समाज की प्राथमिकता सूची में होना चाहिए था, कहीं ऐसा न हो बाजार की हाथ आपके गाँवों में पहुंच जाए बोतल, और जार में पैक पानी की रूप में, अगर इससे बचना है तो जलस्रोतों, बावड़ी, तालाबों और कूओं क़ो बचाना होगा. अरे! आप तो मानव हैं उन बेज़ुबान पक्षीयों, जानवरों के बारे में सोचिए वे कहाँ से पानी पिएंगे ? कैसे बचाएंगे जान अपनी? क्या कसूर है उनका? कौन देगा उन्हें बोतल बंद पानी कहाँ से पैसा लाएंगे ? इसलिए उन बेज़ुबान पक्षीयों और जानवरों क़ो ख्याल कर, अपने आने वाली पीढ़ी का ख्याल कर पानी क़ो बचाएँ. आप अपनी संवेदना क़ो मरने न दें, नहीं तो पूरा समाज मर जाएगा. मुझे पूरी उम्मीद है कि आप अपनी संवेदना मरने नहीं देंगे और पानी बचाने के लिए आप सरकार पर निर्भर नहीं रहेंगे. आप खुद आगे बढ़ कर प्रकृति के अनमोल उपहार क़ो बचाकर सभी लोगों के लिए सुलभ करेंगे. पानी के बगैर विलासिता के तमाम वस्तु बेकार है. शिवाजी चौधरी -प्रधान सम्पादक, अनुराग भारत, सम्पर्क - 9334375496

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