बोझ बनती बुढ़ापा

बोझ बनती बुढ़ापा

 भारत में बुजुर्गो की स्थिति दिनोंदिन दयनीय होती जा रही है. वे न केवल शारीरिक़ बल्कि आर्थिक समस्याओं , वच्चों की उपेक्षा, अकेलापन से भी जूझ रहे हैं. उनके लिए जो थोड़ी - बहुत कल्याणकारी योजनाएं है भी, तो वे धरातल पर ठीक से लागू नहीँ हो रहे हैं. ऐसे में उनका दर्द कौन सुने ? कैसे चलेगा उनकी जिंदगी ? कुछ दिन पहले एक खबर सुर्खियां बनी और कुछ अनुतरित सवाल छोड़ गई. दिल्ली में नब्बे साल का बुखार से पीड़ित और कुपोषण का शिकार एक वृद्ध इस गफलत में कई दिन तक अपनी पत्नी के शव क़ो रखे रहा कि वह जीवित है. वृद्ध - दम्पति की कोई संतान नहीँ थी. वर्षो से वे न्यूनतम खुराक लेकर या डाकघर में जमा रकम से मिलने वाले मामूली व्याज में से कुछ पैसा बचाने के लिए बिना कुछ खाए रह रहे थे. यह सिर्फ एक घटना नहीं है ये केवल एक बुजुर्ग के साथ नहीँ ऐसे न जाने देश में कितने बुजुर्ग रोज मरते होंगे. बढ़ती उम्र सीमा, सामाजिक और पारिवारिक उपेक्षा, उस पर सरकारी उदासीनता ने बुजुर्गो क़ो इस कदर अलग - थलग कर दिया है कि बुढ़ापा उनके लिए अभिशाप बन गया है. कहने क़ो बुजुर्गो क़ो वरिष्ठ नागरिक का तमगा देकर उन्हें कुछ सुविधाएं देने की औपचारिकता जरूर की गई है, लेकिन कुल मिलाकर बुजुर्गो की सुध लेने वाला कोई नहीं है. संयुक्त परिवार के विघटन के बाद तो उनकी पारिवारिक स्थिति और दयनीय हो गई है. 2011 की जनगणना के आंकड़ों के मुताबिक दस करोड़ से ज्यादा वरिष्ठ नागरिकों में से डेढ़ करोड़ एकाकी जीवन बिताने क़ो विवश हैं. समय - समय पर हुए सर्वें बताते हैं की बुजुर्ग उपेक्षा, दुर्व्यवहार और प्रताड़ना के शिकार हो रहे हैं. बुजुर्गों के घर में उपेक्षित व प्रताड़ित होने के कारणों में प्रमुख है -- अपनी संतानों से उनका तालमेल न बैठ पाना और अपनी जरूरतों के लिए उनका संतानों पर पूरी तरह निर्भर रहना. उम्र सीमा बढ़ना भी बुजुर्गो के लिए समस्या बनता जा रहा है. साठ साल से ज्यादा उम्र के लोगों की संख्या कुल आबादी के साढ़े सात फीसद के आसपास है. देश के बीस बड़े राज्यों में से सतरह में साठ साल से ज्यादा उम्र के लोगों में महिलाओं की संख्या पुरुषों के मुकाबले ज्यादा है और वे अपेक्षा व प्रताड़ना का ज्यादा शिकार भी हैं. इसे आधुनिकता का दोष माने या युवा पीढ़ी में संस्कारों की कमी, पर ठीकरा फोड़े या एकल परिवारों के बढ़ते चलन से बुजुर्गो क़ो सामाजिक व्यवस्था की मुख्यधारा से काटने की प्रवृति का हवाला दे, सच तो यह है कि देश के हर चार में से एक कुछ मामलों में तो हर तीन में एक बुजुर्ग शारीरिक प्रताड़ना का शिकार है. रिश्तेदारों का तो खैर बुजुर्गो के प्रति सहानुभूतिपूर्ण रवैया होने का आधार ही नहीं बनता, अपने सगे भी उन्हें सम्मानजनक सहारा नहीं देते. छप्पन फीसद मामलों में तो सगा बेटा हीं इसके लिए जिम्मेदार होता है. तेइस फीसद मामलों में पुत्रवधुओं पर उंगलियां उठती है. इस समस्या का एक पहलू यह भी है कि केवल 47 फीसद मामलों में हीं बुजुर्ग अपने साथ हुए दुर्व्यवहार की शिकायत करते हैं.आधे से ज्यादा इसकी हिम्मत नहीं जुटा पाते. इन तिरपन फीसद मामलों में से करीब अस्सी फीसद इस शर्म से शिकायत नहीं करते क्योंकि उन्हें लगता है कि इससे परिवार की बदनामी होगी.साठ साल से ज्यादा उम्र के चालीस फीसद लोगों क़ो अनिद्रा की शिकायत रहती है. गाँवों में ऐसे दस फीसद और शहरों में चालीस फीसद लोग मधुमेह का शिकार हैं. तीस फीसद से ज्यादा आंतों की बीमारीयों से ग्रस्त हैं. संयुक्त राष्ट्र का अनुमान है कि दुनिया में साठ साल से ज्यादा के लोगों की जो आबादी 1995 में 54 करोड़ बीस लाख थी वह 2026 में बढ़कर 120 करोड हो जाएगी. इसी आधार पर योजना आयोग ने अनुमान लगाया कि 2025 तक देश में बुजुर्ग कुल आबादी का बारह फीसद होंगे लेकिन उनकी दशा क्या होगी, इसका जो अनुमान लगाया गया है वह काफ़ी वेदनापूर्ण है. 2025 में दस प्रतिशत बुजुर्ग हिलने डुलने की हालत में नहीं होंगे. लिहाजा उनका विशेष ध्यान रखना होगा. बुजुर्गो की ज्यादा संख्या क्योंकि ग्रामीण इलाकों में होंगी लिहाजा उन तक सुविधाएं पहुंच पाना एक बड़ी चुनौती होगी. रही महिलाओं की बात तो बुजुर्ग महिलाओं की संख्या पुरुषों से आगे निकल रही है. केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय का आकलन है कि बुजुर्ग महिलाओं की संख्या पुरुषों से आगे निकल रही है. ऐसा नहीँ है कि बुजुर्गो की समस्या केवल भारत में हीं है. दुनिया भर में बुजुर्ग पारिवारिक उपेक्षा का शिकार होकर अकेलेपन से जूझ रहे हैं. विकसित देशों में हालांकि सरकारी स्तर पर उन्हें सहारा देने की मजबूत व्यवस्था है. भारत जैसे परिवार केंद्रित समाज में कहने क़ो सरकार ने कुछ कथित कल्याणकारी योजनाएं बुजुर्गो के लिए चला रखी है. लेकिन वे कागजों पर ज्यादा है, जमीनी स्तर पर उनकी मौजूदगी और उपयोगिता कम हीं दिखती है. बुजुर्गो की संख्या क़ो देखते हुए उन योजनाओं का दायरा भी काफ़ी सिमित है. परिवार से प्रताड़ित और सरकार से उपेक्षित झूरियों और निराशा से भरे बुजुर्ग महानगरों में हीं नहीं छोटे शहरों और कसबों तक में छोटे मोटे काम कर गुजारा करने क़ो अभिशप्त हैं. परिवार इन्हें बोझ मानते हैं और सरकार क़ो लगता है कि वृद्धावस्था पेंशन के नाम पर बुजुर्गो क़ो थोड़ी बहुत खैरात बाँट देने से उसकी जिम्मेदारी पूरी हो जाती है. यह खैरात भी सबको कहाँ मिल पाती है. योजना आयोग के एक समिति का मानना है कि करीब चार करोड बुजुर्ग पेंशन पाने का हकदार हैं. ग्रामीण विकास मंत्रालय का रिकार्ड बताता है कि इनमें से एक तिहाई लोगों क़ो हीं पेंशन दी जा रही है. 2006 में विश्व बैंक ने असलियत खोली थी कि तब आठ फीसद बुजुर्ग पेंशन पा रहे थे. एक और अध्ययन का आकलन है कि देश के सबसे गरीब बीस फीसद बुजुर्गो में से केवल पंद्रह फीसद हीं पेंशन का लाभ ले पा रहे हैं. कुछ राज्यों ने अपने स्तर पर वृद्धावस्था पेंशन की राशि बढ़ाई है. बहरहाल पेंशन योजना का लाभ उन बजुर्गो क़ो नहीँ मिल पाता जिनके पास यह साबित करने का प्रमाण नहीँ होता कि वे ग़रीबी रेखा के निचे हैं. ये तमाम दयनीय स्थितियाँ सवाल उठाती हैं कि आबादी के दसवें हिस्से की सुध लेने की कोई सार्थक पहल कभी हो पाएगी क्या ? शिवाजी चौधरी, प्रधान सम्पादक, अनुराग भारत सम्पर्क : 9334375496

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