युद्ध में मोदी का कूटनीतिक संतुलन

युद्ध में मोदी का कूटनीतिक संतुलन

पश्चिम एशिया के युद्ध से उत्पन्न वैश्विक संकट से पूरी दुनिया अब प्रभावित होने लगी है. ईरान के खिलाफ जारी युद्ध क़ो अब विश्व व्यवस्था में एक निर्यायक मोड के रूप में देखा जा रह है. इस युद्ध से अमेरिका की छवि दुनिया में धूमिल हुई है, खासकर गल्फ देशों में, खाड़ी के देशों का संरक्षक अमेरिका हीं था, उसी अमेरिका क़ो ईरान युद्ध में चुनौती दे रहा है. उसके खाड़ी के सारे बेसों पर सटीक हमला कर रहा है. अमेरिका से आखिर इतनी बड़ी गलती हुई कैसे ? वास्तव में, संघर्ष में उतरने से पहले तेहरान क़ो लेकर गलत आकलन कैसे? कहीं व्हाइट हाउस वेनेजुएला में जिस आसानी से उसने सफलता पाई थी. उससे भी उसे खुद के सर्वक्तिमान होने का विश्वास हो गया था. उसे लगा की अलग - थलग पड़े ईरान क़ो कुचलने का सुनहरा अवसर है. अमेरिका की दूसरी भूल ईरान में सत्ता परिवर्तन के लिए व्यापक बमबारी क़ो पर्याप्त माना गया. हालांकि अमेरिका की युद्ध रण नीति का हिस्सा होता है उसके कमान एवं कंट्रोल क़ो तेजी छिन्न - भिन्न करके उसको या तो पीछे हटने क़ो मजबूर कर देना या आत्मसमर्पण क़ो बाध्य कर देना. दूसरे विश्व युद्ध के बाद से जमीनी जंग के खिलाफ घरेलू दबाव और लॉजिस्टिक मुश्किलों के कारण विनाशकारी बमबारी अभियान के प्रति अमेरिका का आकर्षण बढ़ा है. एक अहम बात है कि इस युद्ध में अमेरिकी सहयोगी मदद करने के बजाए एक बोझ साबित हुए हैं. जैसा की राष्ट्रपति ट्रम्प ने खुद भी माना है कि फारस की खाड़ी और पश्चिम एशिया के अमेरिकी ठिकानों पर ईरान ने जिस तेजी व प्रभावी तरीके से पलटवार किया, वह आश्चर्यजनक था जबकि, ये ठिकाने सामरिक कार्रवाईयों के लिए बेहद अहम माने जाते हैं. सैटेलाइट ( उपग्रह ) से मिली तस्वीरें बताती है कि पाँच देशों में स्थित सात अमेरिकी ठिकानों पर 25 जगहों पर हमले हुए, जिनसे चेतावनी रडार, रसद भवन, ईंधन भंडारण कंटेनर आदि क़ो नुकसान पहुंचा. अपने कुशल सैन्य रणनीति व तकनीकी उपलब्धियों के बुते ईरान ने इस कदर मजबूत प्रतिरोधी क्षमता हासिल की है. अनवरत बमबारी के बावजूद अमेरिका - इजराइल इस बार ईरान की सैन्य ताकत क़ो कमजोर करने या उसकी राजनितिक व्यवस्था क़ो तोड़ पाने में विफल रहा है. अमेरिका - ईरान युद्ध में प्रतिपक्ष के नेता बार - बार सवाल उठा रहे हैं कि भारत खुलकर ईरान का समर्थन क्यों नहीँ?अमेरिका व इजराइल के प्रति झुकाव दिखता है ? ये कोंग्रेसी प्रधानमंत्री नरसिंह राव के सत्ता - काल में ईरान के साथ गहरे रिश्तों के बावजूद 1992 - 93 में इजराइल क़ो भारत में पूर्ण दुतावास के साथ राजदूत रखने की मिली अनुमति की याद करना चाहिए. उस समय राव साहब पश्चिमी प्रभाव के बावजूद वर्ष 1993 में बिजिंग जाकर चीन से पहला बड़ा मैत्री समझौता भी किया था. वर्तमान वैश्विक संकट के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के सिमित सार्वजनिक बयान और एक हद तक मौन पर भी कुछ राजनितिक पंडित एवं कुछ कलम के पंडित सवाल उठा रहे हैं. इस संदर्भ में मुझे एक महापुरुष का वक्तव्य याद आ रहा है उन्होंने कहा - ' जानते हैं, भारत में सबसे सफल नेता कौन हो सकता है ? भारत में सफल नेता क़ो निर्मम होने का साथ - साथ तपस्वी की तरह शांत रहना होगा. सन 1983 में सातवाँ गुटनिरपेक्ष सम्मेलन दिल्ली के विज्ञान भवन में हुआ. इसका उदघाटन क्यूबा के राष्ट्रपति फिदेल कास्त्रो ने किया. इसमें फिलिस्तिनी नेता यासिर आराफात सर्वाधिक महत्व पा रहे थे. एक मौके पर वह जॉर्डन क़ो लेकर भड़क गए, तो प्रधानमंत्री इंदिरा गाँधी ने उन्हें किसी तरह मनाकर बहिष्कार से रोका. तब भी ईरान, इराक व कम्पूचिया ( कमबोड़िया ) के विवाद गंभीर थे. जाहिर है वर्तमान परिदृश्य में ईरान, इजराइल, अमेरिका, रूस, चीन व यूरोप से संबंधों क़ो साधते हुए मोदी सरकार भी भारतीय हितों और दूरगामी आर्थिक संबंधों की रक्षा का प्रयास कर रही है. स्वतंत्रता के बाद हमारी विदेश नीति - गुटनिरपेक्षता, उपनिवेशवाद - विरोध और अरब देशों व फ्लस्तीन का समर्थन. इसी कारण शुरुआती दशकों में भारत ने इजराइल से दुरी और ईरान व अरब देशों से निकटता बनाए रखी. भारत और ईरान के ऐतिहासिक और सांस्कृतिक संबंध हजारों वर्ष पुराने हैं - फ़ारसी भाषा का भारतीय प्रशासन और संस्कृति पर गहरा प्रभाव रहा है. सूफ़ी परम्परा और सांस्कृतिक संबंध रहे हैं. 1950 - 70 के दशक में ईरान अमेरिका के करीब था. भारत गुटनिरपेक्ष रहा, पर दोनों के बीच व्यापार चलता रहा. ऊर्जा ( तेल )का बड़ा स्रोत ईरान बना. इस्लामी क्रांति के बाद (1979) ईरान पश्चिम विरोधी हो गया. फिर भी भारत ने संतुलन बनाए रखा. दोनों से संबंध जारी रहे. 1990 के बाद सोवियत संघ के पतन के साथ भारत और ईरान ने सहयोग बढ़ाया. चाबहार बंदरगाह परियोजना उसी का हिस्सा है. चाबहार बंदरगाह भारत के लिए काफ़ी अहम है, क्योंकि यह पाकिस्तान क़ो किनारे कर अफगानिस्तान तक पहुंचने का रास्ता देता है.भारत ने जहाँ ईरान से रिश्ते बनाए रखा है, वहीं अमेरिका और इजराइल के साथ संबंधों क़ो लेकर भी सावधानी बरत रहा है. इसीलिए वर्तमान युद्ध में भारत ने ' संयम और संवाद ' की अपील बार - बार कर रहा है. 1962, 1965, 1971 के युद्ध में इजराइल ने हमारी मदद की नरसिंह राव के सत्ता में आने के बाद वर्ष 1992 में बड़ा बदलाव हुआ. 29 जनवरी, 1992 क़ो उसके साथ पूर्ण राजनितिक संबंध स्थापित हुए. नई दिल्ली में इजराइल का दुतावास खुला. यह भारत की विदेश नीति का ऐतिहासिक मोड था. वर्ष 1990 से 2010 तक रणनीतिक साझेदारी के तहत रक्षा सहयोग तेजी से बढ़ा. 1999 के कारगिल युद्ध में इजराइल ने हथियार दिए. मिसाइल, ड्रोन निगरानी, तकनीक में सहयोग किया. 2014 के बाद उससे संबंध और मजबूत होने लगे. 2017 में पहली बार किसी भारतीय प्रधानमंत्री का इजराइल दौरा हुआ. रक्षा, कृषि तकनीक व एआई में सहयोग के लिए समझौता हुए. इजराइल भारत का प्रमुख रक्षा साझेदार बन गया है. हम हर वर्ष अरबों डॉलर के रक्षा उपकरण उससे खरीदते हैं. 2020 के बाद तो सामरिक संबंध भी क़ायम हो चुके हैं. भारत की सबसे बड़ी कूटनीतिक सफलता ईरान और इजराइल, दोनों के साथ संतुलन साधना है. यह संतुलन बेहद जरूरी है, क्योंकि हमें ऊर्जा सुरक्षा ईरान से मिलती है, जबकि रक्षा व तकनीक के लिए इजराइल का साथ आवश्यक है. चुंकि पश्चिम एशिया में भारतीय प्रवासियों की संख्या करोड़ों में है, इसलिए वैश्विक राजनीति में संतुलन बनाए रखना बेहद जरूरी है वो भी इस युद्धकाल में तो और इसका ख्याल रखना होगा.शिवाजी चौधरी, प्रधान सम्पादक, अनुराग भारत मीडिया ग्रुप, सम्पर्क : 9334375496

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