बस्ते के बोझ तले दबा बचपन
कहते हैं वच्चों में भगवान बसते हैं यानी, बच्चा भगवान का रूप होता है. किसी भी देश की तरक्की इस बात पर निर्भर करता है कि वहाँ के नागरिक सुशिक्षित हैं. इसमें कोई दो राय नहीं कि जिस देश के नागरिक अधिकाधिक संख्या में सुशिक्षित होंगे, वह प्रगति के नित नए कीर्तिमान गढ़ेगा. सुशिक्षित नागरिक तैयार करने के लिए जरूरी है कि वच्चों की प्राथमिक शिक्षा पर ध्यान दिया जाए. प्राथमिक शिक्षा हीं समुचि शिक्षा व्यवस्था की नींव होती है. भारत की प्राथमिक शिक्षा व्यवस्था में अगर कुछ खूबियां है तो बहुत सारी खामियाँ भी है. एक तरफ सरकारी स्कूलों में सुविधाओं का आभाव, शिक्षक की कमी तो दूसरी तरफ निजी विद्यालयों द्वारा शिक्षा क़ो व्यवसाय के रूप में चलाया जाना देश के लिए, समाज के लिए घातक है. शिक्षा आज खरीद - फरोख्त की वस्तु बन गईं है. शिक्षा स्टेटस सिम्बल बन गया है, महंगे स्कूलों में अपने वच्चों की दाखिला दिलाना तथा समाज में अपना अलग पहचान बनाने की होड़ सी लगी है. आज हमारे समाज में जो जितना महंगे स्कुल में अपने वच्चों क़ो दाखिला करता है वो उतना हीं सम्पन्न और सुशिक्षित माना जाने लगा है. निजी बिद्यालय धीरे - धीरे दुकान का रूप लेता जा रहा है, जहाँ हर कुछ बिक रहा है, मोज़े, बेल्ट, किताब, कॉपी, ड्रेस आइ कार्ड, इत्यादि. विद्यालय कभी ज्ञान का मंदिर हुआ करता था लेकिन आज ज्ञान का मंदिर तो कम दुकान ज्यादा हो गया है. शिक्षा एक व्यवसाय का रूप ले लिया है. आप हीं बताइये आपके इर्द - गिर्द कितने निजी विद्यालय चल रहे हैं आप सोंचिये ये विद्यालय कुकुरमुत्ते कि तरह गली - गली में क्यों पनप रहे हैं. क्योंकि विद्यालय एक साफ - सुथरा व्यवसाय माना जा रहा है. प्राथमिक शिक्षा या उच्च शिक्षा किसी भी शिक्षा में गुणवत्ता के लिए मुख्य रूप से दो बातें सर्वाधिक आवश्यक होती है -- श्रेष्ठ और पर्याप्त शिक्षक और उत्तम पाठ्यक्रम. शिक्षकों की कमी तो है हीं. उत्तम पाठ्यक्रम की हालत भी खस्ता है. हालत यह है कि एलकेजी कक्षा का वच्चा जब स्कूल से निकलता है तो पीठ पर लदे बस्ते के बोझ के मारे उससे चला नहीं जाता. आज वच्चों पर उनकी शारीरिक और मानसिक क्षमता से कहीं अधिक शैक्षिक बोझ डाला जा रहा है. वर्ग एक से छः सात के वच्चों के पाठ्यक्रम में अंग्रेजी माध्यम के स्कूलों ने सोलह - सतरह किताबें चला रहे हैं, या कहिए बेंच रहे हैं. मैं निजी विद्यालयों के प्रबंधकों, निदेशकों, व्यवस्थापकों और सरकार से भी पूछता हुँ क्या सोलह - सतरह विषय वच्चों के पाठ्यक्रम में शामिल करना जरूरी है. अगर नहीं जरूरी है तो फिर क्यों अनावश्यक बस्ते की बोझ कोमल मन वच्चों पर लादी जा रही है, क्यों? भारत के भविष्य क़ो कुबड़, बनाया जा रहा है. नर्सरी, एलकेजी के वच्चों क़ो मैं जब पीठ पर लदे बस्ते की बोझ से झुका देखता हुँ तो मुझे एहसास होता है कि हमारा देश कैसे 2030 तक चीन क़ो पछाडेगा, हमारा नौनिहाल तो बस्ते की बोझ तले दबता जा रहा है.
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| शिवाजी चौधरी, प्रधान सम्पादक, अनुराग भारत मीडिया ग्रुप, सम्पर्क : 9334375496 |
भारत का भविष्य शारीरिक और मानसिक दोनों रूप से कमजोर होता जा रहा है. मैं समाज के उन बुद्धिजीवियों, सरकार के उच्चधिकारीयों और सरकार में बैठे राजनेताओं से करबद्ध विनती करता हुँ कि वच्चों के अनावश्यक पाठ्यक्रमों क़ो हटाकर भारत के भविष्य क़ो कमजोर होने से बचाइए अंग्रेजी माध्यम से प्राथमिक शिक्षा प्राप्त कर रहे बच्चों के लिए जो पाठ्यक्रम दिखता है, उसे किसी लिहाज से उन वच्चों की बौद्धिक क्षमता के योग्य नहीं कहा जा सकता. कारण की उसमें केजी कक्षा के वच्चों के लिए तैयार पाठ्यक्रम दूसरी - तीसरी कक्षा के वच्चों के पाठ्यक्रम जैसा है. ऐसे पाठ्यक्रम से यह उम्मीद करना बेईमानी है की वच्चे कुछ नया जानेंगे, बल्कि सही मायने में तो ऐसे पाठ्यक्रम के बोझ तले दबकर वच्चे पढ़ी चीजें भी भूल जाएंगे. जाहिर है कि ऐसा पाठ्यक्रम बच्चों की बौद्धिक क्षमता के अनुसार किसी लिहाज से उपयुक्त नहीं है . इसके बावजूद अगर इस तरह का पाठ्यक्रम स्कूलों द्वारा स्वीकृत है तो इसका सिर्फ एक हीं कारण दिखता है -- निजी विद्यालयों क़ो मोटा - मुनाफा. वच्चों के इस भारी - भरकम पाठ्यक्रम की ढेर सारी किताबें अभिभावकों क़ो स्कूल से हीं लेना होता है. स्कूल संचालकों और प्रकाशकों के बीच मिलीभगत होती है. इसमें मुनाफाखोरी का बड़ा गोरखधंधा चल रहा है. केंद्र और राज्य सरकारें इस तरफ से आँखें बंद किए हुए है. भारत की प्राथमिक शिक्षा - व्यवस्था के संबंध में यह बात पूरी तरह से स्पष्ट हो जाती है कि अभी इसमें ढांचागत, शिक्षागत कई कमियाँ है, इसके चलते देश के तमाम वच्चों का भविष्य अंधकार में जा रहा है. योग्य अध्यापक तभी आएंगे जब अध्यापकों के चयन की प्रक्रिया भ्र्ष्टाचार और सिफारिशी प्रक्रिया से मुक्त प्रतिभा आधारित होगी. निजी विद्यालयों के व्यवस्थापक कम तनख्वाह पर अध्यापक रखेंगे तो योग्य शिक्षक कहाँ से मिल पाएंगे. इसलिए निजी विद्यालयों के व्यवस्थापकों क़ो योग्य शिक्षक रखना चाहिए ताकि वच्चों क़ो सही और अच्छी शिक्षा उपलब्ध हो. इसके अलावा सरकारी स्कूलों क़ो आधुनिक बनाने की जरूरत है. निजी विद्यालयों, संस्थानों द्वारा शिक्षा देने के नाम पर किए जा रहे भीषण आर्थिक शोषण से पीड़ित बच्चों के अभिभावक सरकारी स्कूलों की गुणवत्ता में सुधार आने पर वच्चों क़ो सरकारी विद्यालय में पढ़ाने पर तनिक भी नहीं हिचकेंगे. उचित होगा की सरकार समय रहते इन चीजों पर विचार करे और कुछ ठोस कदम उठाए, जिससे कि देश के तमाम नौनीहालों का भविष्य अंधकार से प्रकाश की तरफ उन्मुख हो सके. अच्छा भोजन, बेहतर स्वास्थ्य, स्वच्छ वातावरण में जीने और उचित शिक्षा हर वच्चे के प्राथमिक अधिकार है, पर हमारे देश में कितने वच्चों क़ो ये अधिकार हासिल है ? संविधान का अनुच्छेद 21 ( ए ) छह से चौदह वर्ष तक के सभी वच्चों की प्राथमिक शिक्षा की गारंटी देता है. शिक्षा का अधिकार अधिनियम 2009 ' भी यहीं कहता है. हाल की जनगणना में साक्षरता दर में 9.2 फीसद की बढ़ोतरी हुई है. महिला साक्षरता दर में 11. 8 की बढ़ोतरी हुआ है. पर हकीकत यह है कि अब भी एकयासी लाख से ज्यादा बच्चे स्कूली शिक्षा के दायरे से बाहर हैं.

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