नशाखोरी से बर्बाद होती युवा पीढ़ी

नशाखोरी से बर्बाद होती युवा पीढ़ी

आजादी के बाद की कांग्रेस सरकारों ने शराब क़ो राजस्व प्राप्ति के लिए बिशेष रूप से उपयोगी पाया. बाद में, तो जनता पार्टी शासन के ढाई वर्ष छोड़ कर सभी सरकारों ने इसे कमाई का महत्वपूर्ण साधन मान इसे गाँव - गाँव पहुंचाया. पहाड़ी इलाकों में इसकी वजह से पूरी की पूरी पीढ़ी बर्बाद हो गई. मैदानी इलाकों में यह धारणा है की पहाड़ी आदमी नशे का आदी होता है. कुछ हद तक यह सच भी है. लेकिन वह इस नशे का गुलाम आदतन नहीं था, बल्कि उसे इसका गुलाम बनाया गया. पर्यावरणविद शेखर पाठक ने अपनी पुस्तक ' नशा एक षड्यंत्र है ' में 1863 - 73 के बंदोबस्ती दस्तावेज का उल्लेख किया है. इस रिपोर्ट में दर्ज है की ' कुमाऊं ' ( गढ़वाल ) या पहाड़ी लोगों में शराब पीने का प्रचलन नहीं था याहां तक की ग्रामीण इलाकों में भी इसकी कोई प्रचलन नहीं थी, और ऐसा तब तक संभव नहीं था जब तक की जगह - जगह पर शराब की दुकानें न खोल दी जाएँ. इसी प्रकार पिलग्रिम ने लिखा है की अल्मोड़ा के प्रसिद्ध व्यापारी काशी शाह के यहाँ सब कुछ मिलता है, पर शराब, बियर और स्पिरिट नहीं बिकती है. इसकी पुष्टि 1856 से 1884 तक कुमाऊं के आयुक्त रहे ब्रिटिश सेना के लेफ्टिनेंट जनरल हैनरी रेमसे के कथन से भी होती है कि ग्रामीण इलाकों में शराब का प्रयोग नहीं होता है और मुझे आशा है की कभी, होगा भी नहीं. मुख्य शहरों के अलावा शराब की दुकानें नहीं खोलने दी जाएगी. लेकिन सर रेमसे की कथनी और ब्रिटिश हुकूमत की करनी में बड़ा फर्क रहा. जैसे - जैसे अंग्रेजी फ़ौज ने पहाड़ों में अपने कंटोनमेंट बनाने शुरू किए शराब का प्रचलन भी बढ़ता गया. ब्रिटिशराज में 1879 -- 80 के दौरान पहाड़ में पहली बार सरकारी शराब की दूकान खुली थी. 1823 में कुमाऊं और गढ़वाल से शराब, दवा और अफीम का कुल राजस्व 534 रूपये था, जो सरकारी शराब की दुकानों के चलते 1882 में 29,013 रुपए तक पहुंच गया. लेकिन इस राजस्व में इतनी ज्यादा बढ़त के बावजूद ग्रामीण इलाकों में शराब का प्रचलन नहीं के बराबर था. धीरे - धीरे सरकारी नीतियों के कारण ग्रामीण इलाकों में भी शराब का प्रचलन बढ़ता गया. इसका परिणाम आज यह हुआ की पूरी युवा पीढ़ी नशे की चपेट में है. शराब ने सबसे ज्यादा महिलाओं के जीवन क़ो प्रभावित किया है. 
शिवाजी चौधरी, प्रधान सम्पादक, अनुराग भारत मीडिया ग्रुप, सम्पर्क : 9334375496

शराब की वजह से अनेकों परिवार तहस - नहस हो गए अनेकों महिलाएं शराबी पति या बेटे की दंश झेल रही है. शराब समाज के लिए अभिशाप है जो हँसता - खेलता चहचहाता परिवार रूपी बगिया क़ो उजाड़ देता है, उसे नफ़रत, घृणा और जहर में बदल देता है. आजादी के कुछ समय बाद से हीं सत्ता और शराब की कॉकटेल का प्रभाव या नशा हमारे पुरे सिस्टम पर हावी होने लगा था. इसे समझने के लिए एक हीं उदाहरण काफ़ी है. 1970 के आसपास मुरादाबाद में सरकारी ठेके की दूकान के सामने खाने का ठेला लगाने वाले अपने पिता की मदद करने वाला एक बच्चा इसी शराब की बदौलत मात्र तीन दशक के भीतर साठ हज़ार करोड की अकूत संपदा का मालिक बन बैठा. जिन तीन दशकों में इस शराब कारोबारी का धंधा दिन दूनी रात चौगुनी प्रगति कर रहा था. उत्तर प्रदेश और बिहार के पर्वतीय जिलों में शराब का कहर भी उतनी हीं तेजी से परवान चढ़ रहा था. " सूर्य अस्त -- पहाड़ मस्त " की छवि के पीछे इसी शराब व्यापारी के पिता का भारी योगदान रहा है.आज हमारी युवा पीढ़ी की चिंता हो रहा है, चिंता इसलिए हो रहा है कि किसी माँ का लाल, किसी परिवार का बेटा या बेटी ऐसे नशे की दलदल में फंस जाते हैं, तो सिर्फ वह व्यक्ति हीं नहीं, बल्कि वो पूरा परिवार तबाह हो जाता है. समाज, देश सब कुछ बर्बाद हो जाता है. ड्रग्स, नशा ऐसी भयंकर बीमारी है, ऐसी भयंकर बुराई है जो परिवार - समाज क़ो बर्बाद कर देता है. नशे क़ो मनोवैज्ञानिक - सामाजिक चिकित्सा समस्या करार देते हुए उन्होंने कहा कि जब कोई बालक इस बुराई में फँसता है तो कभी - कभी हम उस बालक क़ो दोषी मानते हैं. हकीकत यह है कि नशा अपने आप में बुरी है. आज कल युवा सूखा नशा के प्रति ज्यादा आकर्षित हो रहे हैं इसे रोकना होगा, बचाना होगा युवा पीढ़ी क़ो.

 

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