पितृ सत्तात्मक समाज में अंतर द्वंधों से जूझती नारी
पितृसत्ता के तमाम विरोध के बावजूद पूरी दुनिया में नारीवाद एक विचारधारा के तौर पर लंबी यात्रा कर चूका है, लेकिन उसकी मंजिल अब भी कोसों दूर है. इसके साथ सबसे बड़ी कमी यह रही कि इसे केवल ' महिलाओं के आंदोलन ' तक सीमित रखने की कोशिश की गई. भारत जैसे पितृसतात्मक समाज में तो स्थिति और भी भयावह है आए दिन नारी उत्पीड़न का मामला टीवी, अख़बार में आता है. कहते हैं पहली क्रांति घर से होती है और पहला आंदोलन खुद से. क्रांति नाजायज बंदिशों से, आंदोलन अपने भीतर के भयाक्रांत माहौल से. लेकिन क्या ये नारीवादी महिलाएं क्रांति की शुरुआत सचमुच घर से करती हैं ? घर की चारदिवारी के अंदर की गैरबराबरी का विरोध क्या वे उसी स्तर पर करती हैं जितनी उग्रता से घर के बाहर करती है. या ' पर्सनल इज पॉलिटिकल ' जैसे सिद्धांतों क़ो दरकिनार कर घर और बाहर, दो अलग - अलग जिंदगी व विचारधारा जीती हैं? मेरे मित्र व सामाजिक कार्यकर्त्ता विजय बताते हैं की :' मेरी कई नारीवादी मित्र हैं, महिला अधिकार के मुद्दों पर अक्सर बहस करती हैं, लेकिन कई बार मैंने उन्हें देखा है कि जब वे स्वयं अपने पार्टनर के साथ होती हैं तो उनका रुख कुछ अलग होता है. एक अच्छी समर्पित पत्नी की तरह व्यवहार करती हैं. उनकी अपनी पहचान, व्यक्तित्व पता नहीं कहाँ चला जाता है. अपने पुरुष दोस्तों से बात करेंगी तो पति से छिपकर. मुझे लगता है कि इनमें और दूसरी महिलाओं में कोई विशेष अंतर नहीं है. फिर उनकी अधिकारों की बातें, आजादी की बातें, बेईमानी लगने लगती है. स्त्री मुक्ती आंदोलन से जुडी अंजलि सिन्हा की सोंच इससे अलग है. कहती हैं, हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि हमारी साथी या पति या परिवार के दूसरे सदस्य उसी समाज से आए हैं, जहाँ से बाकी लोग हैं. उनमें भी पितृसत्ता के वहीं तत्व हैं जो समाज में है. बल्कि हम स्त्रियों के अंदर भी पितृसत्ता अलग - अलग घोषित - अघोषित रूपों में अपनी जड़ें जमाए हुए है. हम भी कई बार अवचेतन रूप से उसे पोषित करने लग जाते हैं. नारीवादी महिलाओं का गैरबराबरी के खिलाफ संघर्ष , घर और बाहर दोनों हीं जगह, एक हीं स्तर पर, बराबर रूप से चलता है. अगर हम यह सोचने लगे कि पहले घर क़ो पितृसत्ता के चंगुल से पूरी तरह निकाल लें, फिर बाहर गैर बराबरी के खिलाफ लड़ेंगे तो हमारी पूरी शक्ति तो घर में हीं लग जाएगी . साहित्यकार गीता श्री का कहना था कि किसी भी विचारधारा के लिए दोहरे मानक नहीं होने चाहिए , कि बोले कुछ, सोंचे कुछ और करे कुछ. इन तीनों में तालमेल बहुत जरूरी है. जागरूकता की शुरुआत घर से होती है. अगर पति और पत्नी अर्थोपार्जन कर रहे हैं तो उनके रिश्ते में काफ़ी हद तक बराबरी आ जाती है. नारीवादी सामाजिक कार्यकर्त्ता रेहाना अदीब के लिए निजी रिश्ते में गैरबराबरी के खिलाफ संघर्ष का सफर आसान नहीं रहा है. उन्होंने कहा,' घर में जब हम बराबरी के हक क़ो पाने की बात करते हैं या उस बराबरी क़ो ढूंढने की कोशिश करते हैं तो वह हमें मिलता नहीं है और जब मिलता नहीं है तो चुप भी रहना हमारे लिए बड़ा मुश्किल होता है.
![]() |
| शिवाजी चौधरी, प्रधान सम्पादक, अनुराग भारत मीडिया ग्रुप, सम्पर्क : 9334375496 |
नारीवाद पुरुष का विरोधी नहीं है यह समझना जरूरी है क्योकि ऐसा करते हीं लैंगिक पहचान क़ो हीं हम प्राकृतिक व प्रधान मानने लग जाएंगे जो की स्वयं पितृ सतात्मक समझ है. नारीवाद प्राकृतिक अंतर का नहीं सामाजिक संस्कृति में चाहे मनु स्मृति की बात हो या किसी दूसरे धर्मग्रंथ की, परिवार संबंधी सभी अधिकार पुरुष क़ो दिए गए हैं. धर्म वह क्षेत्र है जिस पर तर्क स्वीकार्य नहीं है , ऐसे में स्वाभाविक है कि उसे परखे बिना सदियों से आत्मसात किया जाता रहा है. स्त्री पुरुष के रिश्ते में घटित होने वाले हर एक कार्य या विचार की चिरफाड़ लैंगिक कैंची से होगी तो रिश्ते कहीं टिक हीं नहीं पाएंगे , क्योंकि सबमें पितृसत्ता किसी न किसी रूप में मौजूद है. पितृसत्ता की जड़े इतनी गहरी और सूक्ष्म हैं कि एक - एक क़ो रेखांकित करना और फिर उनपर प्रहार करना, एक लंबी प्रक्रिया है. ऐसी सामाजिक गठन के साथ कैसे ये नारीवादी महिलाएं बराबरी के लिए संघर्ष करती हैं? वरिष्ठ नारीवादी कार्यकर्त्ता जया श्रीवास्तव कहती हैं, ' मैंने आपसी रिश्तों क़ो कभी इस आधार पर नहीं देखा कि ये काम मैं क्यों करूँ या ये काम मुझे क्यों दिया जा रहा है. मुझे अपने बच्चों के लिए कभी कुछ पकाने की इच्छा है या कभी कोई अच्छी सी डिश जो पति क़ो पसंद है. स्त्री पुरुष दोनों हीं रिश्ते क़ो चलाने के लिए कुछ समझौते करते हैं, एक दूसरे क़ो खुश रखने की कोशिश करते हैं. नारीवादी होने का यह अर्थ नहीं है कि हम अपने अधिकारों की बात तो खूब करें लेकिन जिम्मेदारी क़ो उठाने से पीछे हट जाएँ. केवल शुष्क विचारधारा से काम नहीं चलता है. घर ' प्यार ' की धुरी पर टिका होता है. जिंदगी के कई रंग होते हैं सब कुछ सफ़ेद स्याह नहीं होता है. पितृसत्ता वाली मानसिकता कोई एक दिन या एक साल की बनाई हुई नहीं है , उसे बदलने में वक्त लगेगा. अगर हम चाहें की सारी बराबरी एक हीं दिन में आ जाए तो यह घर तोड़ने वाली बात होगी. धीरे - धीरे सीढ़ी चढ़ना है. नारीवादी लेखिका वर्जीनिया वुल्फ आर्थिक रूप से स्वनिर्भर रही. उनकी आंटी ने वसीयत में इतना पैसा छोड़ रखा था, जिससे उन्हें हर महीने पांच सौ पाउंड जेब खर्च के तौर पर मिलते थे, जो उनके लिए पर्याप्त था. उस आर्थिक आजादी क़ो उन्होंने महसूस किया था. वह एक खुले वैवाहिक जीवन क़ो जी रही थी, जिसमें पति - पत्नी क़ो पूरी आजादी थी की वे अपने मन मुताबिक काम करें. रिश्ते बनाएं, आपसी संबंध उसमें किसी तरह की दखल नहीं देंगे. ऐसा हीं कुछ हम ज्यां पॉल सात्र और सिमोन द बोडवार के रिश्ते में भी देखते हैं. उन दोनों ने अपने रिश्तों के बीच के स्पेस क़ो खत्म नहीं किया. हम उन्हें आदर्श बनाने की बात नहीं कर रहे हैं. लेकिन संबंधों में उस निजी ' स्पेस ' की बात कर रहे हैं जो स्त्री के ' हिस्से ' में कम हीं आती है. वर्जिनिया नारीवाद क़ो एक मानसिक अवस्था मानती थी. वह स्त्री कि स्वनिर्भरता की पक्षधर थी. वह उस ' स्पेस ' की बात करती थी जो स्त्री क़ो अपनी सृजनात्मकता बनाए रखने के लिए जरूरी था. ' स्पेस ' यानि अपने रिश्ते, अपनी पसंद, अपनी इच्छा के लिए स्पेस यानि कोई रोक - टोक या हस्तक्षेप न हो, लेकिन क्या व्यावहारिक जीवन में परिवार के इस तंत्र में स्त्री क़ो वह स्पेस मिल पाता है. एक नारीवादी स्त्री उस स्पेस के लिए कितना संघर्ष कर पाती है.

0 Response to "पितृ सत्तात्मक समाज में अंतर द्वंधों से जूझती नारी"
एक टिप्पणी भेजें