अंग्रेजी माध्यम के नाम पर निजी विद्यालयों में लूट
आजकल अंग्रेजी का आकर्षण इस कदर बढ़ गया है कि हर माँ - बाप और अच्छे खाते - पीते या सम्पन्न घरों से लेकर कमजोर तबकों , मेहनत मजदूरी करने वाले लोग भी अपने बच्चों क़ो अंग्रेजी माध्यम के स्कूलों में हीं पढ़ाने के इच्छुक रहते हैं. भले हीं अपने खान - पान, रहन - सहन में उन्हें कटौती करना पड़े लेकिन अपने बच्चों क़ो अंग्रेजी माध्यम के स्कूलों में हीं पढ़ाना चाहते हैं. इसका फायदा उठा कर आजकल हर गली - मोहल्ले में खुल गए अंग्रेजी माध्यम के स्कूलों के बोर्ड लगे दिख जाते हैं. इन पर लिखी इबारत पढ़ कर कभी - कभी सोंचना पड़ जाता है कि जो लोग खुद सही अंग्रेजी नहीं लिख या बोल सकते, जिन्हें ए, बी, सी, डी से आगे इन अक्षरों से बनने वाले शब्दों और वाक्यों क़ो ठीक से जानकारी नहीं, वे बच्चों क़ो क्या और कैसा पढ़ाते होंगे ! कई बार तो ऐसा भी देखा गया है कि बच्चे घर से सही अंग्रेजी लिख कर लाते हैं और विद्यालय में शिक्षक उनके सही लिखे हुए क़ो भी ठीक करने के नाम पर गलत बता देते हैं. इन तमाम विद्यालयों में अंग्रेजी का भूत इस कदर हर वक़्त उपस्थित रहता है कि बच्चे हिन्दी में बोलने से तो डरते हीं हैं, गलत अंग्रेजी बोलने पर शिक्षक की डांट खाने का भी डर रहता है. अक्सर ऐसी खबरें आती रहती है, जिनमें किसी बच्चे क़ो अंग्रेजी के बजाए कोई और भाषा बोलने पर दंडित करने का ब्यौरा होता है. जगह - जगह कुकुरमुत्ते के समान खुल गए और चल रहे इन छोटे -- मोटे शिक्षण संस्थानों की बात तो दूर, बर्षो से स्थापित और केंद्र सरकार के बिभिन्न विभागों से मान्यता प्राप्त विद्यालयों में भी देखा जा रहा है कि वहाँ के अध्यापकों का अंग्रेजी ज्ञान आधा - अधूरा होता है. ज्ञान का उद्देश्य मनुष्य क़ो मनुष्य बनाना है. शिक्षा प्राप्त हीं इसलिए की जाती है कि हम मानवीय मूल्यों पर चलते हुए अपने उज्ज्वल भविष्य का आधार रख सकें. पर अब शिक्षा बहुत महंगी होती जा रही है और इसका उद्देश्य केवल भारी वेतन वाली नौकरी प्राप्त करना हो गया है. जहाँ शिक्षा सस्ती और मुफ्त में मिल रही है वहाँ वह मुश्किल में है. सीबीएसई बोर्ड के नए शैक्षिक सत्र शुरू हो गया है. अभिभावकों क़ो किताब, कॉपी, ड्रेस, टाई, बेल्ट , री एडमिशन, डेवलपमेंट चार्ज आदि अनेकों फीस के नाम पर लुटा जा रहा है. बच्चों क़ो होनहार बनाने की चाहत में अभिभावकों का स्कुल द्वारा तय दुकानों से या स्कुल से हीं कॉपी, किताब, ड्रेस तथा अन्य सामान लेना मजबूरी बना है. मोटे - मुनाफे के लिए सीबीएसई की एनसीआरटी की किताबों के लगाने की गाइड क़ो दरकिनार कर निजी प्रकाशकों की किताबों से पढ़ाया जा रहा है. जो महंगी होने के साथ पढ़ाई के स्तर से एनसीआरटी से काफ़ी नीचे है. हर साल मार्च में बच्चों की सालाना रिजल्ट आने के साथ अप्रैल में अगली क्लास के लिए स्कूलों में दाखिले चालू हो जाते हैं. अपने बच्चे की अच्छी शिक्षा दिलाने के लिए ऊँचे स्कूल में दाखिला कराना माँ - बाप की चाहत होती है इसलिए बिहार बोर्ड की जगह शानदार बिल्डिंगों वाले सीबीएसई स्कूलों की तरफ दौड़ते हैं जहाँ अभिभावकों क़ो बिल्डिंग फीस के साथ बिभिन्न मदों में रकम वसूल की जाती है. जिसमें सामान लेने वाले दुकान का नाम व पता छपा रहता है. इस दुकान के अलावा संबंधित स्कूल की सामग्री दूसरी दूकान पर नहीं मिलती है. कहा जाता है कि किताबें मंगाने की एवज में प्रकाशक द्वारा कमीशन पहले हीं दे दिया जाता है. जबकि ड्रेस, कॉपी, किताब का कमीशन दुकानदार द्वारा स्कूलों क़ो दिया जाता है.
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| शिवाजी चौधरी, प्रधान सम्पादक, अनुराग भारत मीडिया ग्रुप, सम्पर्क : 9334375496 |
हर साल अप्रैल आते हीं अंग्रेजी शिक्षा के नाम पर लूट - खसोट चालू हो जाता है. शहर में गजब का माहौल पैदा हो जाता है. जिधर देखो उधर अभिभावक किताब की दुकानों पर लंबी कतार में खडे धक्के खा रहे हैं. किसी क़ो दो किताब मिला तो किसी क़ो पांच मिला किताबों का शॉर्टेज होता रहा अभिभावक किताब के दूकान का चक्कर लगाते रहे. उसी तरह हर साल निजी बिद्यालयों द्वारा ड्रेस बदलने का भी गोरखधंधा चलता रहता है, ड्रेस के नाम पर भी अभिभावकों क़ो लुटा जाता है. शहर में ड्रेस केवल एक - दो दुकानों पर हीं मिलता है. जो लिस्ट स्कूल द्वारा दिया जाता है इसमें भी स्कूल प्रशासन ( व्यवस्थापक ) की अच्छी कमाई हो जाती है. सीबीएसई नियमों के तहत स्कूल प्रबंधकों क़ो छात्रों से वसूली गई फीस का इस्तेमाल सिर्फ स्कूलों में जन सुविधाएं, अध्यापकों क़ो वास्तविक तनख्वाह आदि पर करना चाहिए. सच तो यह है कि शिक्षा क़ो बाजार के पंजे से हर हाल में निकालना होगा, वरना यह हमारे बच्चों के भविष्य क़ो डंस लेगी. शिक्षा व्यवस्था में बड़ा बदलाव लाने की जरूरत है. अभी तो ऐसा लगता है कि हम बाजार के हिसाब से सब कुछ तय कर रहे हैं. पर क्या बाजार शिक्षा के साथ - साथ वह संस्कृति और मूल्य दे पा रहा है. वे मूल्य जो पहले हमारे गुरुकुल और मदरसों का हिस्सा थे. हमें हर हाल में अपने बच्चों क़ो ईमानदारी के साथ और उसके सही संदर्भ में शिक्षा प्राप्त करने की प्रेरणा देनी होगी. जरूरी नहीं है कि बच्चे इंजीनियर या डॉक्टर बनेंगे तभी उनका भविष्य उज्जवल हो सकता है. पहली से आठवीं तक की शिक्षा पूरी तरह मुफ्त हो जाने के बावजूद प्रवेश शुल्क से लेकर किताबों और यूनिफार्म की कमीशन खोरी के लिए अभिभावकों की जेब काटने वाले शिक्षा के दुकानदारों के प्रति अधिकारियों का श्रद्धा भाव देखते हीं बनता है. इस कारण शिक्षा के बाज़ारीकरण पर अंकुश के तमाम नियमों की परवाह न करते हुए अधिकारी लोग उन्हें प्रोत्साहित करने के लिए उनके बार्षिकोत्स्व में घंटों समय गुजारने में अपने क़ो शर्मिंदा महसूस नहीं करते

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