लावारिस बच्चों की बेबसी

लावारिस बच्चों की बेबसी

 बच्चे जिन्हें हम लावारिस कहते हैं , हैं कौन ? कहाँ से आते हैं ? सड़क जन्म देती है उन्हें , धरती उगलती है या आसमान से टपकते हैं ............... ? दरअसल , लावारिस बच्चे ' व्यवस्था और समाज ' पैदा करता है. इस समाज में से हीं किसी न किसी घर ने मजबूर किया है इन बच्चों क़ो ' सड़क के बच्चे, लावारिस बच्चे या गुमशुदा बच्चे ' बनने के लिए. इन बच्चों की बड़ी त्रासदी यहीं है कि इनकी भावनाओं क़ो सुनने समझने का न तो किसी के पास वक्त है, न हीं समझ............ एक तरफ समाज के कुछ लोग बच्चों के हाथ - पैर काटकर उनसे भीख मंगवाते हैं , अपनी तिजोरी भरने के लिए उन्हें आमदनी का जरिया बनाते हैं. दूसरी तरफ बाकी समाज नाली के कीड़े की तरह सड़क के बच्चों से नफ़रत करते हैं............. क्यों? सड़क के बच्चे विकसित होते सभ्य और अपने आपको आधुनिक कहने वाले समाज की पैदाइश है , यह कितना शर्मनाक है कि असमान विकास ने इन बच्चों क़ो घर में नहीं टिकने दिया और सभ्य होने का दबाव उन्हें दोबारा घरों में जाने से रोकता है. " सड़क के बच्चे ", जिन्हें सड़क पैदा नहीं करती , पर फिर भी यह कहलाते सड़क के हीं बच्चे हैं , क्योंकि सड़कों का जाल हीं घर की तरह इनकी परवरिश करता है. भोर के उजाले से रात की कालिमा तक ये बच्चे सड़कों पर यहाँ - वहाँ बिखरे रहते हैं. ये बच्चे हमलोगों की जिंदगीयों से ऐसे जुड़े हैं , जैसे दीवार की इटों की बीच ' कच्ची गारा ' या ' ' सीमेंट ' कार, ऑटो, बस, ट्रेन की यात्रा में हर जगह, हर रोज, ये बच्चे हमसे टकराते हैं '. शुबह दफ्तर के लिए घर से निकलेंगे तो कोई लाल बती पर ख़डी चकमक गाड़ियों के शिशों क़ो साफ करता मिलेगा या तो कोई अख़बार के बंडल उठाए गाड़ियों के मकड़जाल में इधर - उधर भागता हुआ. घूमने निकलेंगे तो कोई बसों में हारमोनियम के साथ फ़िल्मी गाने के टूटे बोल सधी धून पर गाता मिलेगा या कोई दो उंगलियों के बीच फंसे पत्थर से बेहद मोहक ताल देते हुए ' माता के गीत गाता हुआ मिलेगा. ट्रेन की लम्बी यात्रा में तो झाड़ू लगाते बच्चों क़ो लगभग हम सभी टोक देते हैं. यहाँ, इसके नीचे कूड़ा रह गया............ इधर से भी . लेकिन इस सफाई के काम के बदले उसे एक - दो रूपये के साथ हिकारत भरी नजर देना लोग नहीं भूलते. छोटी सी ढोलकी बजाकर ताल देते भाई और उसी ताल पर लोहे के छोटे से गोल घेरे में से अपनी बदन क़ो दोहरा करके निकालती उसकी छोटी बहन क़ो हम कहीं भी देख सकते हैं. दिन के तेरह - चौदह घंटे काम करने के बाद बचपन बचता है भला ? एक अनुमान के मुताबिक भारत में करीब चार लाख से ज्यादा बच्चे लावारिस हैं इनमें ज्यादातर सड़क पर या झुग्गी - झोपडी या रेलवे स्टेशनों पर गुजारा करते हैं. एक स्वयं सेवी संस्था के मुताबिक सिर्फ राजधानी दिल्ली में करीब एक्यावन हज़ार बच्चे बेघर रहते हैं , जिनमें से बीस प्रतिशत लड़कियाँ हैं. इनमें से पचास प्रतिशत बच्चे कभी न कभी यौन हिंसा के शिकार हुए हैं. चार - पांच साल से लेकर सोलह - सतरह साल की उम्र के ये बच्चे, उम्र से पहले व्यस्क हो जाते हैं. जिंदगी की मार हीं कुछ ऐसी पड़ती है कि बचपन , किशोरावस्था और युवावस्था जिए बिना हीं ये बच्चे बूढ़े हो जाते हैं. 
शिवाजी चौधरी, प्रधान सम्पादक, अनुराग भारत मीडिया ग्रुप, सम्पर्क : 9334375496
ज्यादातर बेघर बच्चे कचरा बीनने का काम करते हैं , कुछ भीख मांगते हैं , कुछ ढाबों आदि पर काम करते हैं , कुछ फल - सब्जी के दुकानों पर काम करते हैं, कुछ कार सफाई का काम करने लगते हैं, कुछ पॉकेट मारने जैसी छोटी - मोटी हेरा - फेरी के कामों में लग जाते हैं. कुछ जाने - अनजाने अवैध माल क़ो इधर से उधर करते हैं. इन कामों से वे सौ - दो सौ रूपये रोज कमा लेते हैं. असल में इन बच्चों की सही संख्या पता करना बेहद मुश्किल काम है, क्योंकि इनका कोई स्थायी ठिकाना नहीं होती........... ये घूमकक्ड होते हैं. इन्हें किसी एक परिभाषा में बांधा नहीं जा सकता, क्योकि जो बच्चे आज ' सड़क के बच्चे हैं,' वे कुछ समय बाद सड़क से हट जाते हैं. भारत के महानगरों और दूसरी श्रेणी के बड़े शहरों में लावारिस बच्चे सबसे ज्यादा हैं. वैसे तो लडके - लड़कियां दोनों हीं घर छोड़ते हैं, लेकिन तुलनात्मक रूप से सड़क के बच्चों में लड़कों की संख्या ज्यादा है. इसका एक अहम कारण यह भी है कि लड़कियों क़ो अक्सर सड़क से हटाकर वेश्यावृति में धकेल दिया जाता है. ' ग़रीबी अक्सर बच्चों क़ो बचपन से हीं ' कमाऊ पूत ' में बदल देती है ये बच्चे जो हर पहर, हर जगह, किसी न किसी रूप में हमारे सामने कठपुतलियों की तरह बेमन से नाचते रहते हैं, चौबीसों घंटा हमारी आँखों के आगे रहकर भी हमारी चिंता, दर्द , प्यार और संवेदना के पात्र नहीं बन पाते, सिर्फ इसलिए क्योंकि वे ' हमारा बच्चा ' नहीं है. अपनी गोद में सुंदर कपड़ों में, हाथ में चॉकलेट या आइसक्रीम थामे, धुले - धुले चेहरों में बैठे बच्चों में और सामने कटे - फ़टे कपड़ों , मैले शरीर और उलझे बालों में करतब दिखाते बच्चों में कितना भेद करते हैं. हमलोग? बच्चे - बच्चे में कितनी फर्क करता है समाज ? सिर्फ इसलिए कि अपने बच्चे साफ - सुथरे , अच्छे कपड़ों मे अच्छी ( विज्ञापन वाली ) चीजें मांगते हैं और सड़क के बच्चे मैले - कुचैले कपड़ों में ' बुनियादी चीजें ' मांगते हैं! विकास के रुख और सभ्यता के पैमाने क़ो कुछ इस तरह से बदले जाने की सख्त जरूरत है कि लावारिस बच्चों के हिस्से में जिंदगी का कुछ हिस्सा तो आ सके. घर - परिवार के बच्चों क़ो ' सड़क के बच्चे ' बनाने से रोकने का जिम्मा किसी एक माँ - बाप, परिवार या संस्था का नहीं है. न सिर्फ माता - पिता, बल्कि पूरे समाज और व्यवस्था ने इन बच्चों से उनका बचपन और सुनहरा भविष्य छीनने की गलती की है . हमें इस गुनाह से उबारना होगा.

 

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