जंजीरों में बँधी नारी
हुक्म नहीं मानने वाली या आदेश क़ो सही ढंग से नहीं समझकर उसका तुरंत पालन नहीं करने वाली पत्नी की पिटाई एक कड़वी सच्चाई है. यह बात भारत - पाकिस्तान समेत कई अन्य दक्षिण एशियाई देशों में कराए गए सर्वेक्षणों से निकलकर आ चुकी है . पाकिस्तान ही नहीं, दुनिया के ज्यादातर समाजों में यह सोंच बेहद आम है कि महिलाएं प्रताड़ना या कहें कि पिटाई के लिए हीं बनी है और हफ्ते - पंद्रह दिन में एकाध मौकों पर ऐसा कर लेने में कोई हर्ज नहीं है. खास तौर से तब जब वे अच्छा खाना न पकाएं, सास - ससुर की सेवा टहल में कमी छोड़ दें, पति के कामकाज में सहयोग देने के बजाए खुद पर ध्यान देने और उसके लिए वक्त निकालने की माँग करें. इन्हीं कायदों का हवाला देते हुए तकरीबन पूरी दुनिया में पत्नी प्रताड़ना के मामले जागरूकता के बावजूद बढ़ रहे हैं. यह तथ्य 2013 में लंदन स्कूल ऑफ़ हाईजीन एंड ट्रॉपिकल मेडिसिन और साउथ अफ्रीका मेडिकल रिसर्च काउंसिल के साथ मिलकर विश्व स्वास्थ्य संगठन द्वारा किए गए अध्ययन में भी सामने आया है. अध्ययन में बताया गया था कि दुनिया भर में एक तिहाई से ज्यादा महिलाएं घर और समाजों के भीतर शारीरिक या यौन हिंसा की शिकार है और आंकड़े गवाह है कि दुनिया में महिलाओं के प्रति हिंसा की समस्या महामारी के स्तर पर पहुंच चुकी है. इस रिपोर्ट के अनुसार करीब पैतीस फीसद महिलाएं अपने करीबी साथी या दूसरे की हिंसा का शिकार होती है. घर की चारदिवारी के भीतर महिलाओं के लिए साथी या पति की हिंसा का सामना करना आम बात हो गई है. इस तरह की हिंसा से भी तीस फीसद महिलाएं पीड़ित है. पिछडे देशों में तो हालात और भी खराब है, क्योंकि वहाँ तो बकायदा क़ानून बनाकर ऐसे पुरुषों क़ो पत्नी की प्रताड़ना के लिए प्रेरित किया जा रहा है. पाकिस्तान में सीआईआई के प्रस्तावित विधेयक की तरह हीं 2014 में अफगानिस्तान की संसद ने भी एक नया क़ानून पास किया था जिसके अनुसार पत्नी, बेटियों और बहनों क़ो पीटने वाले पुरुषों क़ो अपराधी नहीं माना जाएगा, बशर्ते उसने यह काम समाज में अपनी प्रतिष्ठा बचाने की खातिर किया हो. अफगानी संसद में पास किया गया वह क़ानून बाल विवाह के बाद ससुराल में प्रताड़ना झेल रही एक बाल - बहू ( चाइल्ड ब्राइड ) सहर गुल से जुडा हुआ था. मामला यह था कि जब सहर गुल ने ससुराल वालों के दबाव के बावजूद पैसा कमाने के मकसद से वेश्यावृति करने से इनकार कर दिया तो उसे घर के तहखाने में भूखे - प्यासे रखकर जंजीरों में जकड़ कर प्रताड़ित किया गया. ऐसी सोंच और कानूनों से पुरानपंथी एशियाई समाजों की स्त्री विरोधी - मानसिकता की एक झलक तो मिलती हीं है. कम - ज्यादा मात्रा में महिलाओं के प्रति यह रवैया दुनिया के अन्य समाजों में भी क़ायम है. आर्थिक तरक्की और तमाम तरह के आधुनिक विचारों के बावजूद स्त्रियों क़ो कई समाजों में आज भी पुरुषों की जागीर की तरह देखा जाता है. ऐसे में अगर कोई स्त्री पुरुषों के मन - मुताबिक आचरण नहीं करती तो उसे मारने - पीटने जंजीरों में जकड़ने, सिगरेट से जलाने, चेहरे पर तेजाब फेंकने और भूखे रखकर मार डालने का अलिखित अधिकार पुरुषों क़ो दिया गया है.
![]() |
| शिवाजी चौधरी, प्रधान सम्पादक, अनुराग भारत मीडिया ग्रुप, सम्पर्क : 9334375496 |
भोजन पकाने या घर के काम निपटाने में जरा - सी - चूक करने से लेकर जाति से बाहर प्रेम या विवाह कर लेने और वांछित काम नहीं करने जैसे - वेश्यावृति कर पैसे कमाने से इनकार करने आदि पर उसे प्रताड़ित करना जायज, ठहराया जाता है.यह भी नहीं मानना चाहिए कि ऐसी समस्याएं सिर्फ गाँव - देहात या खाप पंचायतों के असर वाले इलाकों क़ो ही हैं. शहरों में और विकसित समाजों में भी महिलाओं क़ो ऐसी हीं प्रताड़नाओं का सामना करना पड़ता है. शायद इसकी एक वजह यह है कि समाज के ज्यादातर कायदों और उनका पालन कराने की जिम्मेदारी मर्दो की मान ली गई है. मर्दो का बनाया यह समाज स्त्री की आजादी की सीमा निर्धारित करता है. इसी नीति के तहत लड़कियों क़ो बचपन से हीं अपने पिता या भाइयों की निर्भरता की घुट्टी पिलाई जाती है. घरों के भीतर जहाँ पुरुष क़ो शोषक और स्त्री क़ो उस पर निर्भर रहने की सीख दी जाती है, वहीं से समाज का भेदभाव शुरू हो जाता है. कोई समाज तभी बदलेगा, जब उसे बदलने की पहल घर के छोटे से दायरे से होगी. समझना होगा कि स्त्री क़ो देवी मानकर साल में दो बार उसकी पूजा कर लेने से कोई पाप नहीं धुलता, बल्कि असली पुण्य तभी मिलता है जब समस्त नारी जगत के प्रति व्यक्ति के मन में सम्मान जगता है. अब यह हमारी चिंता का विषय होना चाहिए कि जिस शहरी और कारोबारी समाज क़ो कथित तौर पर पढ़ा लिखा और सभ्य माना जाता है, वहाँ भी महिला अस्मिता क़ो कुचलने की मानसिकता अभी तक क्यों क़ायम है. इससे स्पष्ट हो रहा है कि चाहे जितने क़ानून बना दिए जाएँ और चाहे जितनी पुलिस - प्रशासनिक व्यवस्था कर दी जाए, अहंकारी मर्दवादी समाज स्त्री क़ो, उसके अहं क़ो और उसकी काबिलियत क़ो ठेंगा दिखाने और उसे कुचलने के लिए आमादा है. इस स्थिति में कोई परिवर्तन तभी होगा, जब खुद समाज के भीतर से स्त्रियों के ऐसे दमन के खिलाफ आवाज़ उठेगी और कुछ संबंधित मामलों में आंदोलन चलाकर बदलाव लाने की कोशिश की जाएगी. सोंचना होगा कि एक स्त्री का अस्तित्व ऐसा क्यों हो कि उसकी उड़ान कोई और तय करे. यहीं नहीं, अगर उसे अपनी योग्यता के बल पर बेबाक जिंदगी जीने का कोई अवसर मिला है तो समाज उसके पर कतरने पर क्यों अमादा हो जाता है. इस सवालों के जबाब मिलेंगे, तो शायद स्त्री प्रताड़ना जैसे दंश कम हो जाएं और महिलाओं क़ो घर - बाहर खुलकर सांस लेने का अवसर मिल सके.

0 Response to "जंजीरों में बँधी नारी"
एक टिप्पणी भेजें