नशे के चंगुल में फंसती बेरोजगार युवा पीढ़ी
हम और हमारे युवा क्या यह सोंचने लगे, आधुनिकता का अर्थ क्या यह हो गया है कि इस देश की आधी काम करने योग्य आबादी अपनी समस्याओं के बारे में न सोंचे और नशे में हीं डूबी रहे? आज के युवा जिस तरह का नशा कर रहे हैं, उसमें मदिरा और कच्ची शराब पुरानी चीजें हो गई हैं. अब हुक्का बार और अन्य मादक पदार्थों के सेवन के मामले देखे जा रहे हैं. सिंथेटिक नशे का दौर आ गया है. दरअसल नशे का कारोबार इतना बड़ा हो गया है कि किसी भी राज्य में नशे का धंधा करने वाले या इस व्यापार के सूत्रधार देश के सुदूर कोने या विदेश में भी मिल सकते हैं. अब तो ड्रोन से भी नशीले पदार्थों की तस्करी हो रही है. हाल यह है कि स्कूलों और कालेजों तक नशीले पदार्थ पहुंच रहे हैं. युवा पीढ़ी असमय बूढी हो रही है, क्योंकि देश ने उसे सस्ता या मुफ्त राशन देकर भूख से न मरने देने की गारंटी तो दे दी, लेकिन रोजगार की नहीं. देश गर्व से फुला नहीं समाता कि हम डिजिटल हो गए. साइबर क्रांति हो गई. मगर स्याह तस्वीर तो यह है कि देश के युवा बेरोजगार हैं और नशे में डूब रहे हैं. हम चाँद पर जाने की कल्पना कर रहे हैं, हम रोबोट युग की कल्पना कर रहे हैं, मगर सपने साकार करने वाली वह पीढ़ी हीं तैयार नहीं कर रहे. इससे पहले युवा पीढ़ी पलायनवादी हो गई थी और डालर और पाउंड के मोह में सात समंदर पार जाकर करोड़पति हो जाना चाहती थी. राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प के ' अमेरिका प्रथम ' के नारे के बाद जब सभी समृद्ध देशों ने यहीं नीति अपना ली, तो हमारे युवा स्वदेश लौटने लगे. मगर उनके सपने धुंधले पड़ गए, क्योंकि यहाँ उनके लिए नौकरी नहीं थी. हालांकि रेवड़ियाँ बाँटने से राजनीतिक दलों क़ो फुर्सत नहीं है. उनके चुनावी एजेंडे में रोजगार नहीं है. दूसरी ओर, बिना काम किए खाते में पैसे दिए जा रहे हैं. ऐसे में युवा पीढ़ी कहाँ जाए ? निराश होकर युवा नशे में डूब रहे हैं. दूसरी ओर, व्यवसायियों ने एक के बाद एक विश्वविद्यालय परिसर तो खडे कर दिए, लेकिन पुस्तक संस्कृति धीरे - धीरे लुप्त हो गई. जहाँ तक हमारे पाठ्यक्रमों, अध्यापन और शोध का संबंध है, उसमें यह परिवर्तन नहीं आया जो इस तेजी से बदलते हुए युग की कल्पना करने वाले देश में आना चाहिए था. सवाल है कि इस बीच नशीले पदार्थों का कारोबार कैसे खड़ा हो गया ? युवा कहे जाने वाले इस देश में बड़ी संख्या में नौजवान नशे की गिरफ्त में क्यों नजर आते हैं? स्थिति इतनी भयावह है कि नशे के शिकार युवाओं की मौत की घटनाएं अक्सर सामने आती है.
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| शिवाजी चौधरी, प्रधान सम्पादक, अनुराग भारत मीडिया ग्रुप, सम्पर्क : 9334375496 |
देश के सरहदी इलाकों में नशे का प्रसार खतरनाक स्तर पर पहुंच चुका है. जब सरहद पर दुश्मन खडे हों और मुकाबला करने वाली युवा पीढ़ी नशे की कंदराओं में भटक रही हो, तो इसका क्या परिणाम होगा, इसे समझा जा सकता है. हैरत की बात है कि कुछ माफिया नशे का कारोबार फैला कर इतनी ऊंचाई पर पहुंच जाते हैं कि वे देश की राजनीति क़ो संचालित करने का सपना देखने लगते हैं. दुखद है कि अब यह संस्कृति हरियाणा और पंजाब में भी दिख रही है. तमाम प्रतिकूल परिस्थितियों के बावजूद अब मानवीय मूल्यों क़ो बचाने की जद्दोजहद भी सामने आ रही है. जब हम नए युग की कल्पना करते हैं, तो उसमें प्रशासन और राजनीतिक नेतृत्व के साथ नागरिकों क़ो भी एकजुट होना चाहिए. यह समस्या चुंकि पुरे देश में गंभीर होती जा रही है, तो जरूरी है कि कहीं से आवाज़ उठे, कोई सार्थक पहल हो. गंभीरता से कार्रवाई हो, तो नशाखोरी खत्म होते देर नहीं लगेगी. इसके लिए दो बातें बहुत जरूरी है. एक तो प्रशासन और राजनीतिक नेतृत्व की प्रतिबद्धता तथा दूसरे जनसमूहों की ईमानदारी से पहल. ऐसा अभी तक संभव नहीं हुआ, लेकिन अगर कहीं भी जन - जागरण होता है, तो अपने आप में आशा की एक किरण है.

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