जिसने आंचल क़ो चारदीवारी से आजादी का रास्ता दिखाया

जिसने आंचल क़ो चारदीवारी से आजादी का रास्ता दिखाया

ऐसी शख्सियत इस्मत आपा की बात कर रहे हैं, मशहूर उर्दू अफसानानिगार इस्मत चुगताई एक जन्मजात विद्रोही व्यक्तित्व. औरतों की व्यक्तिगत आजादी की तड़प से लबरेज. कदम - कदम पर उनके जिंदगी जीने के ढंग और कहे - लिखे पर बेशुमार खतरे. पर उन सबसे जूझने लड़ने का माद्दा तो उनके भीतर बचपन से था. जन्म उनका 21 अगस्त 1915 क़ो उत्तर प्रदेश के बदायूं शहर में हुआ था. मध्यवर्गीय परिवार में जन्मी इस्मत आपा छह भाइयों और चार बहनों में सबसे छोटी थी. पर उन्होंने छुटपन से हीं लड़कों के साथ बराबर का हक हासिल करने की कोशिश की. सादा लिबास पहनने की जिद और ज़ेवर - गहनों क़ो ठुकराने का साहस. शहीद लतीफ से विवाह किया. जिसे वे एक आदर्श समझौता भी कहा करती थी. औरतों की पढ़ाई की हिमायत, परदे का विरोध, यानि जहाँ कहीं स्त्रियों की आजादी और उनके आगे बढ़ने का सवाल आया, इस्मत आपा उनके आगे बढ़ने का सवाल आया, इस्मत आपा उनके समर्थन में आगे चल कर गई. वे कहा करती थी कि कांग्रेस की जीत इसलिए हुई कि औरत - मर्द दोनों ने विदेशी माल का बायकाट किया. गाँधी ने एक बार उनकी ऑटोग्राफ बुक पर हस्ताक्षर करने से मना कर दिया था, क्योंकि वे विदेशी कपड़े पहनी थी. उन्होंने उसी वक्त खादी भंडार से खादी की धोतियाँ खरीदी. गाँधी यह देखकर खुश हो गए और उन्होंने ऑटोग्राफ दे दिए. इस्मत आपा ने औरत और मर्द दोनों की जहालत, जुल्म और ज़्यादती के खिलाफ कलम उठाई. वे मानती थी कि अगर मर्द ज़ालिम, नाइंसाफ, चोर - उचक्का है, तो सबसे पहले वह औरत मुजरिम है जिसने, उसे अपने ऐशो - आराम की खातिर चोर, उठाइगीर और मुर्दा बनाया है. उन दिनों इस्मत कम्युनिस्ट मुल्कोँ में, जहाँ औरत और मर्द क़ो बराबर की मेहनत का बराबर का फल मिलता था, उसकी अक्सर चर्चा किया करती थी. उन पर बहुत आरोप लगे. किसी ने उन्हें अशलील कहा तो किसी ने नास्तिक और कम्युनिस्ट. शायद वे उर्दू की पहली लेखिका थी, जो अपनी रचनाओं में ' अशलीलता ' के आरोप में अपनी मजहबी आकाओं द्वारा प्रताड़ित की गई. लेकिन वे हारने वाली महिला नहीं थी. उन्होंने अपनी मर्जी से जीना सीखा था. उनके कहने और लिखने की आजादी उनसे कोई छीन नहीं पाया. लाहौर हाई कोर्ट में उनकी मशहूर कहानी ' लिहाफ ' पर मुकदमा चला था, लेकिन वह टिका नहीं. ' गेंदा ' उनकी पहली कहानी थी, जो 1949 में उर्दू की प्रसिद्ध साहित्यिक पत्रिका ' साकी ' में प्रकाशित हुई थी. उनकी कृतियों में 'जिद्दी ' ( 1941) के बाद ' मासुमा ' ' सैदाई ' ' जंगली कबूतर ' ' दिल की दुनिया ' ' अजीब आदमी ' और बांदी तक उनका चमकीला उपन्यास संसार फैला पड़ा है. ' कलियां चोटे ' ' एक रात ' छुई - मुई ' ' दो हाथ दोजखी,' शैतान ' उनके कहानी संग्रह है . हिन्दी में ' कुंवारी ' और अंग्रेजी में उनकी कहानियों के तीन संग्रह -- अत्यंत चर्चित हुए जिनमें ' काली 'विशिष्ट है. इस्मत आपा ने फिल्मों के लिए भी लेखन किया, जिनमें ' गरम हवा ' क़ो कई पुरस्कार मिले. यह सफरनामा 1943 में उनकी पहली फ़िल्म ' छेड़छाड़ ' से शुरू हुआ. उर्दू और हिन्दी की साहित्यिक दुनिया में इस्मत आपा का लेखन समान रूप से समादूत है. इस्मत आपा ने मरने से पहले बड़ी हसरत से कहा था :
शिवाजी चौधरी, प्रधान सम्पादक, अनुराग भारत मीडिया ग्रुप, सम्पर्क : 9334375496
 ' काश, आज मुझे मरते हुए हसन मंटो देखता '. यानी वह मंटो क़ो भी शिकस्त देकर जीत हासिल कर लेंती. मैं सोचने क़ो मजबूर हूँ कि इस्मत आपा ने किस तरह वसीयत की होगी कि उन्हें मरने के बाद बजाए कब्र में दफनाने के हिन्दुओं की तरह जलाया जाए. 1981 में उर्दू के प्रख्यात कथाकर रामलाल जी क़ो इस्मत आपा ने एक लम्बा पत्र लिखा था, जिसे पढ़ कर ' औरत ' ' सेक्स ' क़ो लेकर उनके विचारों का खुलासा है : " अरे भाई तुमने कन्हैयाजी क़ो ' औरतबाज ' कह कर बड़ा जी जलाया. एक वहीं ढंग के भगवान हैं. सबसे ज्यादा प्रोग्रेसिव, और मुसन्नीफ ( लेखक ) तो थे हीं, यानी अपनी हीं जात बिरादरी के हुए.गीता की तखलीक (रचना ) की. सबसे बड़ी कारामात यह थी कि उन्होंने औरत क़ो भी इंसानों की सफ में शुमार किया. दुनिया के किसी अदब में इस जिंदादिलेरी से औरत क़ो मर्द से -- इजहार -ए -इश्क करने की मिसाल नहीं मिलेगी. किसी तहजीब ने आशिक और मर्द क़ो माशूक बनाने पर तवज्जो नहीं दी. फ्रांसिसी और अंग्रेजी अदब में भी औरत हीं महबूबा है और ज्यादातर रंडियों ने हीं आजाद इश्क किया है, जिसे नीचा और कारोबारी रंग दे दिया है. राधा शादीशुदा है, मगर कृष्ण के इश्क में ऐसी दीवानी हुई कि पूज डाली गई. इतनी बागी और मुंहजोर आशिक की मिशाल कहीं और नहीं मिलेगी. औरत तो दुनिया में महबूबा बनाकर भेजी गई है. इस पर आशिक हुआ जा सकता है. लेकिन शरीफ औरत चोरी - छूपे कर भी डाले इश्क तो या तो डूब मरती है या जहर खाकर फना हो जाती है. और ब्याही औरत का पति भगवान होता है, खुदा - ए मजाजी होता है. " औरत क़ो पाँव की जूती बना कर क्या मर्द वाकई जिंसी (शारीरिक ) आसूदगी हासिल कर सकता है. जरूरत से ज्यादा मुरगान खाने से बदहजमी और अक्सर हैजा हो जाता है. पैर की जूती चबाकर कोई निगलने लगे तो क्या पेट भर सकेगा. रोटी की भूख से मौत हो सकती है. मगर जो रोटी की मार देते हैं, गरीबों का हक दबाकर अपने लिए ऐश खरीदते हैं, उनमें जिंसी ऐश सबसे महंगे पड़ते हैं कि औरतों के कुनबे पालने पड़ते हैं. उन कुनबों के मर्द भी तो ऐश पालते हैं. उन्हें भी औरतों के गोल चाहिए. मुल्क की दौलत का ज्यादा हिस्सा हाकिम और उनके मुसाहिबान के हिस्से में उगता है. जहाँ - जहाँ इम्पीरियलीज्म पला है और अब भी सरमायदारों की सूरत में पल रहा है, वहाँ जवान भूखे मर रहे हैं. बस चोर डाकू ऐश कर सकते हैं.

 

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