सरदार वल्लभभाई पटेल का राष्ट्र - निर्माण चिंतनःएकीकरण, सुशासन एवं नैतिक अर्थव्यवस्था के द्वितीय दिवस पर राष्ट्रीय संगोष्ठी सम्पन्न

सरदार वल्लभभाई पटेल का राष्ट्र - निर्माण चिंतनःएकीकरण, सुशासन एवं नैतिक अर्थव्यवस्था के द्वितीय दिवस पर राष्ट्रीय संगोष्ठी सम्पन्न

अनुराग भारत संवाददाता विनोद कुमार राम 
भभुआ कैमूर- भारतीय ऐतिहासिक अनुसंधान परिषद (आईसीएचआर), नई दिल्ली के सहयोग से सरदार वल्लभभाई पटेल कॉलेज, भभुआ एवं आर.के. इंस्टीट्यूट, जद्दूपुर के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित द्विदिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी “सरदार वल्लभभाई पटेल का राष्ट्र-निर्माण चिंतन : एकीकरण, सुशासन एवं नैतिक अर्थव्यवस्था” के द्वितीय दिवस के विभिन्न सत्र अत्यंत गंभीर, विचारोत्तेजक और शोधपरक विमर्श के साथ संपन्न हुए। 15 मई 2026 को आयोजित प्रथम सत्र “स्व. प्रो. लक्ष्मण राय व्याख्यानमाला” के रूप में संपन्न हुआ, जबकि द्वितीय सत्र और समापन सत्र में भी देश के विभिन्न शैक्षणिक संस्थानों से आए विद्वानों ने अपने विचार रखे।
द्वितीय दिवस के प्रथम सत्र का आयोजन सेमिनार हॉल, एस.वी.पी. कॉलेज, भभुआ में गौरव पांडेय के सत्र-संयोजन में संपन्न हुआ। सत्र का प्रारंभ डॉ. अरविंद द्वारा स्वागत भाषण एवं अतिथि परिचय से हुआ। इसके उपरांत स्व. प्रो. लक्ष्मण राय व्याख्यानमाला के अंतर्गत वक्ताओं ने सरदार वल्लभभाई पटेल के राष्ट्र-निर्माण दृष्टिकोण, प्रशासनिक क्षमता, राष्ट्रीय एकता तथा समकालीन प्रासंगिकता पर अपने विचार रखे। इस सत्र में डॉ. राजकिशोर ने पटेल के राजनीतिक व्यक्तित्व और संगठन क्षमता को रेखांकित किया, जबकि डॉ. पवन कुमार ने राष्ट्रीय एकीकरण की प्रक्रिया में उनके ऐतिहासिक योगदान का विश्लेषण किया। डॉ. ऋषभदेव ने सरदार पटेल की दूरदर्शिता को भारतीय राज्य-व्यवस्था के सुदृढ़ीकरण से जोड़ा तथा डॉ. विनय ने सुशासन और जनहितकारी प्रशासन की अवधारणा पर महत्वपूर्ण विचार प्रस्तुत किए।

प्रथम सत्र के अध्यक्षीय उद्बोधन में डॉ. संतोष कुमार यादव ने कहा कि सरदार वल्लभभाई पटेल केवल लौहपुरुष नहीं, बल्कि आधुनिक भारत के संस्थापक निर्माताओं में प्रमुख थे, जिनकी कार्यशैली में राष्ट्रीय प्रतिबद्धता, व्यावहारिक बुद्धि और प्रशासनिक दृढ़ता का अद्वितीय समन्वय था। सह-अध्यक्षीय उद्बोधन में डॉ. सुरेंद्र कुमार सिंह ने पटेल के व्यक्तित्व को भारतीय लोकतांत्रिक संरचना की स्थिरता और अनुशासन से जोड़ते हुए कहा कि आज भी उनका चिंतन भारत के लिए दिशासूचक है। सत्र का धन्यवाद ज्ञापन डॉ. बृजराज प्रसाद गुप्ता ने किया, जबकि प्रतिवेदन का दायित्व डॉ. प्रफुल्ल दुबे ने निभाया।

द्वितीय सत्र का में स्वागत भाषण एवं अतिथि परिचय प्रफुल्ल कुमार दुबे ने प्रस्तुत किया। इस सत्र में डॉ. दीपक कुमार श्रीवास्तव ने सरदार पटेल की ऐतिहासिक भूमिका को भारतीय संघवाद और प्रशासनिक एकता की कसौटी पर परखा। डॉ. आनंद कुमार त्रिपाठी ने राष्ट्र-निर्माण की प्रक्रिया में पटेल के व्यावहारिक दृष्टिकोण पर प्रकाश डाला। डॉ. कल्पना सिंह ने नैतिक अर्थव्यवस्था और नेतृत्व-आधारित राज्य-निर्माण के संदर्भ में अपने विचार व्यक्त किए, जबकि डॉ. शशिकेश गौड़ ने सरदार पटेल के विचारों की समकालीन उपयोगिता पर जोर दिया। अध्यक्षीय उद्बोधन प्रो कमला सिंह ने दिया और सह-अध्यक्षीय उद्बोधन डॉ राकेश मेहता ने प्रस्तुत किया। अंत में आजाद अंसारी ने धन्यवाद ज्ञापन किया।

समापन सत्र का संचालन डॉ. वंशीधर उपाध्याय एवं डॉ. प्रियंका कुमारी मिश्रा के संयोजन में संपन्न हुआ। स्वागत भाषण एवं अतिथि परिचय डॉ. आनंद प्रकाश ने प्रस्तुत किया। इस सत्र में विशिष्ट अतिथि प्रो. मनोज कुमार राय ने कहा कि सरदार वल्लभभाई पटेल का राष्ट्र-दर्शन भारतीय सांस्कृतिक अस्मिता, प्रशासनिक नैतिकता और राजनीतिक यथार्थबोध का समन्वित प्रतिरूप है। मुख्य अतिथि सह वक्ता प्रो. ध्रुव कुमार सिंह ने अपने विस्तृत उद्बोधन में कहा कि भारतीय राष्ट्र-निर्माण की प्रक्रिया को समझने के लिए पटेल के योगदान का गंभीर पुनर्पाठ आवश्यक है, क्योंकि उन्होंने एकीकरण को केवल राजनीतिक कार्य नहीं, बल्कि राष्ट्रीय दायित्व के रूप में संपन्न किया।

समापन सत्र के अध्यक्षीय उद्बोधन में डॉ. सीमा पटेल ने कहा कि इस प्रकार की संगोष्ठियाँ नई पीढ़ी को इतिहास के जीवंत आयामों से परिचित कराती हैं। सह-अध्यक्षीय उद्बोधन में डॉ. नेयाज़ अहमद सिद्दीकी ने अंतरविषयी विमर्श की आवश्यकता पर बल दिया, जबकि मार्गदर्शक वक्तव्य में डॉ. श्रीकांत सिंह ने आयोजन की अकादमिक सार्थकता की सराहना की। रिपोर्ट प्रस्तुति डॉ. संगीता सिंह ने की तथा धन्यवाद ज्ञापन डॉ. अखिलेंद्र नाथ तिवारी ने किया। इस प्रकार द्वितीय दिवस के सभी सत्र गंभीर बौद्धिक संवाद, ऐतिहासिक पुनर्पाठ और राष्ट्र-निर्माण संबंधी विमर्श के साथ सफलतापूर्वक संपन्न हुए।

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