बिहार विधान सभा के माननीय अध्यक्ष डॉ. प्रेम कुमार ने "भारत छोड़ो आंदोलन" के शहीदों को नमन करते हुए कहा कि यह भारतीय स्वतंत्रता संग्राम का एक निर्णायक अध्याय था, जिसकी शुरुआत 8 अगस्त 1942 को महात्मा गांधी ने "करो या मरो" के नारे के साथ मुंबई के ग्वालिया टैंक मैदान में की थी। इसे “अगस्त क्रांति” भी कहा जाता

बिहार विधान सभा के माननीय अध्यक्ष डॉ. प्रेम कुमार ने "भारत छोड़ो आंदोलन" के शहीदों को नमन करते हुए कहा कि यह भारतीय स्वतंत्रता संग्राम का एक निर्णायक अध्याय था, जिसकी शुरुआत 8 अगस्त 1942 को महात्मा गांधी ने "करो या मरो" के नारे के साथ मुंबई के ग्वालिया टैंक मैदान में की थी। इसे “अगस्त क्रांति” भी कहा जाता

बिहार विधान सभा के माननीय अध्यक्ष डॉ. प्रेम कुमार ने "भारत छोड़ो आंदोलन" के शहीदों को नमन करते हुए कहा कि यह भारतीय स्वतंत्रता संग्राम का एक निर्णायक अध्याय था, जिसकी शुरुआत 8 अगस्त 1942 को महात्मा गांधी ने "करो या मरो" के नारे के साथ मुंबई के ग्वालिया टैंक मैदान में की थी। इसे “अगस्त क्रांति” भी कहा जाता है। इस दौरान पूरे देश में अंग्रेजों के खिलाफ अभूतपूर्व प्रदर्शन हुए थे और सही मायनों में स्वतंत्रता की निर्णायक नींव रखी गयी। इस जन-आंदोलन ने औपनिवेशिक शासन की वैधता को गंभीर रूप से चुनौती दी और यह स्पष्ट हो गया कि अब भारत पर अंग्रेजों का शासन स्थायी नहीं रह सकता। ध्यातव्य है कि महात्मा गांधी और जवाहरलाल नेहरू के जेल में होने की अवधि में अरुणा आसफ अली, राम मनोहर लोहिया, जयप्रकाश नारायण जैसे नेताओं ने उल्लेखनीय भूमिका निभाई और भारत में वैकल्पिक नेतृत्व का अविस्मरणीय अध्याय जुड़ा।

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