भारतीय राजनीति में नैतिक मूल्यों का गिरता स्तर
2019- 2020 - 2024 आम चुनाव एवं 2025 के बिहार विधानसभा चुनाव में भी वहीं हुआ जो भारतीय राजनीति में नैतिक मूल्यों का गिरता स्तर क़ो परिलक्षित करता है. राजनीति में नेता एक दूसरे पर आरोप - प्रत्यारोप लगाते रहते हैं, निजी आक्षेप भी होते रहे हैं. लेकिन सत्तारूढ़ दल का नेता, मुख्यमंत्री या प्रधानमंत्री या उस स्तर का कोई नेता जब निजी आरोप लगाता है, तो ऐसा लगता है कि आरोप एक किस्म की बौखलाहट में लगाया गया है. अक्सर यह आरोप निराधार हीं होता है, उदाहरणस्वरूप 16 अप्रैल 1974 क़ो इंदिरा गाँधी ने ओडिसा की एक सभा में जयप्रकाश नारायण पर एक निजी आरोप लगाया उन्होंने कहा ' जो लोग सेठ के पैसे पर पलते हैं, उन्हें भ्र्ष्टाचार के खिलाफ आंदोलन का अधिकार नहीं है, हालांकि उन्होंने जेपी का नाम नहीं लिया था, लेकिन यह बात जेपी क़ो हीं कही गई थी कि वे सेठों के पैसों पर पलते हैं, उन्हें भ्र्ष्टाचार के खिलाफ आंदोलन करने का नैतिक अधिकार नहीं है. उस आरोप से जेपी बहुत विचलित हुए थे उन्होंने 1952 से लेकर लगाए गए आरोप के समय तक अपने खर्च का पूरा ब्यौरा जारी किया. जेपी एक उच्च नैतिक मूल्यों वाले व्यक्ति थे. उन्होंने आरोप क़ो गंभीर माना और यह जरूरी समझा कि अपने ओर से उसका स्पष्टीकरण दें. बिहार विधानसभा 2020 में बिहार के मुख्यमंत्री जिस भाषा का प्रयोग किया वो शर्मनाक है उन्होंने नेता प्रतिपक्ष तेजस्वी यादव के बहनों, एवं पूर्व मुख्यमंत्री राबड़ी देवी क़ो लेकर सार्वजनिक मंच से आठ - आठ नौ - नौ बेटियों क़ो जन्म देने पर सवाल उठाया, ये भाषा निंदनीय है, शर्मनाक है राजनीति का स्तर इतनी नहीं गिरनी चाहिए की निजी एवं माता की ( महिला ) मर्यादा भंग हो इस शालीनता क़ो बनाए रखना हीं हमारी शिष्टाचार, एवं लोकतंत्र की खूबसूरती होनी चाहिए. हालांकि नीतीश कुमार अपने शिष्ट एवं शालीनता के लिए जाने जाते हैं, लेकिन शायद चुनावी बौखलाहट में पलटवार निजी हमले के रूप में तेजस्वी यादव पर किया क्योंकि तेजस्वी यादव के दस लाख युवाओं क़ो पहली कलम से रोजगार देने का वादा नीतीश की परेशानियां बढ़ा दिया था. इससे नीतीश बौखलाए हुए थे, और लगातार तेजस्वी यादव पर निजी हमलावर थे. हालांकि प्रधानमंत्री ने भी अपने चुनावी भाषण में तेजस्वी के नाम लिए बगैर जंगलराज का युवराज करार दिया. कहा था कि इस समय बिहार का चुनाव असाधारण परिस्थिति में हो रहा है. एक तरफ कोरोना महामारी का खतरा है तो दूसरी ओर जंगलराज वाले फिर से मौके की ताक में हैं. जिन लोगों के पास अपहरण उद्योग की कॉपीराइट है, वे अगर आ गए तो सरकारी नौकरी छोड़िए, नौकरी देने वाले प्राइवेट कम्पनियाँ भी नौ - दो ग्यारह हो जाएंगी राहुल गाँधी पर भी निशाना साधते हुए उन्होंने कहा कि बिहार में भी डबल युवराज का वहीं हश्र होगा, जो उत्तरप्रदेश चुनाव में हुआ था. इसी तरह 1 नवंबर, 1974 क़ो इंदिरा गाँधी ने लोकसभा भंग करने की माँग पर बातचीत के लिए जेपी क़ो प्रधानमंत्री निवास बुलाया और बातचीत के क्रम में कहा की ' आप देश के बारे में सोचिए ' जेपी ने कहा, इंदु मैंने पूरी जिंदगी देश के बारे में काम करने के अलावा किया क्या है ? कहने का तात्पर्य है कि सत्तारूढ़ नेतृत्व बौखलाहट में जेपी पर भी आरोप लगा सकता है.जेपी ( जिन्हें बाद में जनता ने अपनी पदवी ' लोकनायक ' से नवाजा ) आजादी के लड़ाई में आए और रुसी क्रांति से प्रभावित रहे उनकी पत्नी प्रभावती जी गाँधी के साथ थी और उनकी दत्तक पुत्री बन चुकी थी. ब्रिटेन सरकार के लिए जेपी चुनौती बन गए और नौजवानों के हीरो. इसी दौरान एक चटखदार शख्सियत और आ पहुंची , वे थे डॉ. राममनोहर लोहिया. लोहिया की मृत्यु, समाजवादी आंदोलन का बिखराव और इंदिरा गाँधी का दुनिया की सियासत में दबदबा सामने था. इसी बीच 1973 का छात्र आंदोलन सामने आ गया और जेपी क़ो उसकी अगुआई करनी पड़ी. जेपी ' जेल गए ' इसके बाद दुनिया की एक ताकतवर नेता इंदिरा गाँधी सत्ता से बाहर फेंक दी गई. जिस दिन जनता दल की सरकार शपथ ग्रहण कर रही थी , वहीं जेपी और इंदिरा गाँधी आमने - सामने खडे थे. बगैर किसी सूचना के जेपी इंदिरा के घर पहुँचे थे. जेपी के कंधे पर सिर रख कर इंदिरा रो रही थी, और भरे आँखों से जेपी इंदिरा के सिर पर हाथ रख रो रहे थे. केवल इतना हीं कहा था जेपी ने --- धैर्य रखो, सब ठीक होगा.पहले के राजनेता भाषा के कमाल में माहिर थे, वे जो कहना चाहते थे, वे कहते थे, और सुनने वालों क़ो गाली नहीं लगती थी, ज्यादा पढ़े लिखे और गंभीर लोग राजनीति में आते थे, डॉ. लोहिया जो आरोप लगाते थे, उसका आधार होता था, यज्ञदत्त शर्मा, प्रकाशवीर शास्त्री आदि ऐसे नेता भी राजनीति में रहे हैं जिन्होंने अपनी वाकपटुता का प्रदर्शन करते हुए गंभीर से गंभीर आरोप बड़े हीं सहज तरीके से लगाए. मर्यादा का ध्यान न सत्तापक्ष रख पा रहा है, और न बिपक्ष, ये आरोप व्यक्तिगत जरूर हैं, लेकिन इनके राजनितिक अर्थ भी हैं, घटना विशेष का संदर्भ है, थोड़ा पीछे जाकर देखें तो सोनिया गाँधी अगर मोदी क़ो ' मौत का सौदागर कहती है, तो इसमें एक खास घटना विशेष का जिक्र छीपा हुआ है. रोज सभाओं क़ो सम्बोधित करने की आपाधापी, नयी बात कहने की चुनौती इस सभी मकसदों क़ो साधने की लालसा में कुछ ऐसी बातें भी कह दी जा रही है जिन्हें उचित नहीं ठहराया जा सकता. हर नेता अपनी शैली के अनुरूप, अपनी सभा में आए लोगों में उत्साह जगाने के लिए आक्रामक बातें कहते हैं, मोदी लोगों का मूड़ देखकर या कहें उनका मूड़ बनाने के लिए ' शहजादे ' ' खुनी पंजे ' ' युवराज ' जैसी शब्दावली का प्रयोग करते हैं जो ठीक नहीं है.मोदी एक रैली में यह भी बोल गए कि कांग्रेस सिबिआई और इंडियन मुजाहिदिन की मदद से चुनाव लड़ रही है.सपा नेता नरेश अग्रवाल ने तो हद कर दी उन्होंने कहा की एक चाय बेचने वाला देश के बारे में नहीं सोंच सकता, उनका यह बयान समंती सोंच क़ो दर्शाता है. दरअसल, यह गिरावट राजनीति में हीं नहीं, समाज में भी आयी है, नैतिक मूल्यों के पतन के कारण समाज में तनाव बढ़ा है, इसलिए आज राजनेता एक दूसरे पर अनर्गल आरोप लगाने से बाज नहीं आते.चुनावी माहौल में सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच आरोप - प्रत्यारोप होना लोकतंत्र की ताकत है, लेकिन इन आरोप - प्रत्यारोप में भाषा की शालीनता, व्यक्तिगत आरोप से बचना चाहिए, राजनितिक प्रतिद्वंधिता में लोकतान्त्रिक मूल्यों क़ो हाशिये पर नहीं धकेल देना चाहिए. सवा सौ साल पुरानी पार्टी भी चुनावी लाभ के लिए पंथीनिरपेक्ष बनाम सम्प्रदायिकता का नारा बुलंद कर रही है. साठ प्रतिशत 18 से 35 साल के मतदाताओं का इतिहास के सहारे मन मोहना चाह रही है. इन दलों क़ो यह याद रखना चाहिए की 21 वीं सदी में युवा मतदाता जाति - पांति, ऊंच - नीच, गरीब - अमीर की राजनीति क़ो तोडना चाह रहा है युवा वर्ग के सामने उसका कैरियर है और समाज और व्यवस्था बदलने के लिए उसका मन कुलबुला रहा है. ऐसे में देश व समाज के चुने हुए इन प्रतिनिधियों का व्यवहार उसके मन क़ो वित्रीषण से भर रहा है. जिसका उदाहरण पड़ोसी मुल्क में दिखाई दे दिया है. हमारे माननीयों क़ो यह याद रखना चाहिए कि वह वर्तमान क़ो तो चौपट कर हीं रहे हैं. देश के भविष्य क़ो भी अंधकारमय बना रहे हैं. केंद्र कि सत्ता में आने क़ो बेचैन पार्टियों के लिए यह सबक है. खुद क़ो सबसे अलग बताने वाली पार्टी क़ो हर वक्त यह साबित भी करना होगा वरना वक्त हर किसी क़ो अपनी कसौटी पर परखेगा. शिवाजी चौधरी, प्रधान सम्पादक, सम्पर्क - 9334375496
0 Response to "भारतीय राजनीति में नैतिक मूल्यों का गिरता स्तर"
एक टिप्पणी भेजें